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नेपाल का भौगोलिक वृत्तांत इसके धरातल, जलवायु एवं आर्थिक विकास के सन्दर्भ में दीजिए।

भारत के उत्तरी भाग में विस्तृत विशाल हिमालय पर्वतश्रेणी के मध्य अंचल में स्थित नेपाल एशिया महाद्वीप का एक छोटा पर्वतीय देश है। इस देश में निवास करने वाले नाटे कद के गोरखे अपने योद्धापन के लिए संसार में प्रसिद्ध हैं। ब्रिटिश शासकों को इन वीर योद्धाओं से बड़ी सहायता मिली थी। नेपाल पर भारत का अधिक प्रभाव है तथा भारत सरकार ने इसके विकास में भी बहुत सहयोग दिया है। तिब्बत के चीन में चले जाने के बाद यह राजनीतिक दृष्टिकोण से और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है क्योंकि यह भारत तथा चीन के मध्य एक सीमा के रूप में है।

नेपाल का भौगोलिक वृत्तान्त इसके धरातल, जलवायु एवं आर्थिक विकास के सन्दर्भ में दीजिए।

स्थिति एवं विस्तार

हिमालय की उपत्यकाओं के मध्य स्थित नेपाल एक ऐसा देश है, जहाँ भौगोलिक परिस्थितियाँ अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और सदियों से इस देश को विशिष्टता प्रदान किये हुए है। भारतीय उपमहाद्वीप में नेपाल की सदैव एक स्वतन्त्र देश की भूमिका रही है, चाहे वह मुगलकाल हो अथवा ब्रिटिशकाल । वास्तविकता यह है कि इसकी भौगोलिक स्थिति ने इसे एक अन्तस्थ राज्य का स्वरूप प्रदान किया है, जो चीन व भारत के मध्य स्थित हिमालय एवं गंगा के मैदान के मध्य स्थित है। इसका विस्तार 26°20′ से 30°10′ उत्तरी अक्षांश एवं 80°15′ और 88°15′ पूर्वी देशान्तर के मध्य है। इसका क्षेत्रीय विस्तार 1,39,860 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। पूर्व से पश्चिम तक इसकी लम्बाई 830 किमी. तथा उत्तर से दक्षिण तक केवल 160 किमी. है। इसके पूर्व, दक्षिण व पश्चिम में भारत के क्रमशः सिक्किम, बिहार व उत्तर प्रदेश राज्य हैं और उत्तर में चीन का तिब्बत प्रदेश है। क्षेत्रफल की दृष्टि से नेपाल विश्व का 88वां बड़ा देश है।

नेपाल का प्राकृतिक स्वरूप

उच्चावच-नेपाल सामान्य रूप से पर्वतीय देश है। नेपाल की संरचना की दृष्टि से यहाँ तीन प्रदेश हैं-दक्षिण में शिवालिक टरशियरी युग के है, मध्यवर्ती क्षेत्र में वलन एवं भ्रंशक्रिया से संरचना जटिल हो गई है तथा सर्वोच्च शिखर वाला प्रदेश जहाँ हिमालय की श्रेणियाँ अपने वास्तविक स्वरूप में हैं। प्रमुख शिखर से उत्तर में ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानें हैं, साथ में घाटियों में परतदार चट्टानों का जमाव है।

नेपाल में समानान्तर पर्वत श्रेणियों का विस्तार है जो पूर्व-पश्चिम में विस्तृत हैं। इसके अन्तर्गत हिमालय की प्रधान श्रेणी भी सम्मिलित है। हिमालय का सर्वोच्च शिखर माउन्ट एवरेस्ट (8,848 मीटर), कंचनजंघा (8,586 मीटर), धौलागिरी (8,167 मीटर), अन्नपूर्णा (8,091 मीटर) आदि उच्च शिखर यहीं पर स्थित है। मुख्य हिमालय से दक्षिण की ओर लघु हिमालय का विस्तार है। इन दोनों के मध्य काठमाण्डू घाटी स्थित हैं, जो लगभग 24 किमी. लम्बी तथा 11.2 किमी चौड़ी है। नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र से अनेक नदियों का उद्भव होता है। ये नदियाँ नेपाल से बहती हुई भारत में प्रवेश करती हैं। इनमें प्रमुख है—कोसी, गंडक, राप्ती, घाघरा, शारदा आदि।
घाघरा नदी को नेपाल में कर्नाली के नाम से पुकारा जाता है। गंडक नदी सात छोटी नदियों के साथ बहती है, अतः इसे सप्त गंडकी नाम दिया गया है।

नेपाल एक पर्वतीय देश है। यहाँ का 75% भाग पर्वतों से घिरा है, जिसकी ऊँचाई 3,000 मीटर से अधिक है और 15% भाग सदैव हिमाच्छादित रहता है। देशका शेष भाग नदी- घाटी बेसिन और मैदानी है। दक्षिण से उत्तर की ओर नेपाल को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) महान हिमालय प्रदेश-इस प्रदेश के कारण नेपाल अन्य देशों से पृथक् हो गया है। उत्तर की ओर से हिमालय एक प्रकार से अप्रवेश्य ही है, केवल कुछ दर्रों द्वारा ही इसको पार किया जा सकता है। यह नितान्त ठण्डा और बर्फीला है। इसमें ऊँची चोटियाँ, गहरे ढाल तथा गहरी घाटियाँ पाई जाती हैं, जिनमें होकर कर्नाली, कोसी और गण्डक नदियाँ हजारों मीटर की गहराई में बहती है। ये सभी नदियाँ हिमालय के उत्थान पूर्व भी बहती थीं। इन नदियों के जल-विभाजक हिमालय की ऊँची चोटियों के सहारे न होकर उत्तर में सुदूर तिब्बत के पठार पर है। इस प्रदेश में तीन ऊँची चोटियाँ पायी जाती है—एवरेस्ट (8,848 मीटर), कंचनजंघा (8,586 मीटर) और धौलागिरी (8,167 मीटर)। यहाँ की जलवायु बड़ी ही कठोर है। ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में कमी आती जाती है। शीतकाल में उत्तर की ओर से आने वाली शीतल पवनें यहाँ तक नहीं पहुँच पाती अतः निम्न दक्षिणी भाग गरम रहता है। जलवायु की दृष्टि से इस प्रदेश में 4,000 से 4,600 मीटर का भाग ही मानव उपयुक्त है और यहाँ सूर्यताप की प्राप्ति के फलस्वरूप कुछ कृषि कार्य किया जाता है। 4,600 मीटर से ऊपरी भागों में लगातार कोहरा और शीत के कारण उत्पादन सम्भव नहीं है। इस सीमा से ऊपर हिम जमी रहती है।

(2) आन्तरिक हिमालय प्रदेश-इस प्रदेश के उत्तर में महान हिमालय तथा दक्षिण में तराई प्रदेशों के बीच में फैला है। इसमें चरंग, डुण्डवा आदि छोटी-छोटी पर्वत श्रेणियाँ और महाभारत लेख पर्वत हैं। इसका ढाल दक्षिण की ओर बड़ा तीव्र तथा उत्तर की ओर धीमा है। इसके उत्तर की ओर उत्तर-पूर्वी ढाल घने वनों से ढके हैं तथा ऊपरी भाग हिमाच्छादित रहते हैं दक्षिणी ढालों पर मिट्टी के अभाव में वनस्पति क्षीण पायी जाती है। इस प्रदेश में महाभारत लेख और महान हिमालय के बीच में नेपाल की प्रमुख काठमाण्डू की घाटी है। यह 24 किलोमीटर लम्बी और 11 किलोमीटर चौड़ी है। इस प्रदेश की जलवायु ऊँचाई के अनुसार परिवर्तित होती है। सामान्यतः शीतकाल साधारण से कठोर और ग्रीष्मकाल गरम तथा वर्षावाला होता है। काठमाण्डू की घाटी की जलवायु इस प्रदेश का सही प्रतिनिधित्व करती है। यह घाटी 1,500 मीटर ऊँची है। यहाँ वार्षिक वर्षा का औसत 125 सेण्टीमीटर है। तापमान जनवरी में 10° सेण्टीग्रेड से जुलाई में 27° सेण्टीग्रेड तक रहते हैं। इस प्रदेश में अधिकांशतः अर्द्धउष्ण कटिबन्धीय वनस्पति (चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन) पायी जाती है। ऊँचे भागों में नुकीली पत्ती वाले वन मिलते हैं। घाटी के क्षेत्र में चावल, गन्ना, जूट, नारंगी और केले पैदा किये जाते हैं।

(3) मध्यवर्ती प्रदेश-यह प्रदेश लगभग 90 किमी. चौड़ा महाभारत लेख के उत्तर और महान हिमालय क्षेत्र के मध्य लगभग 60-100 किमी. चौड़ा, 2,500 से 4,550 मीटर ऊँचा और 600-2000 मीटर ऊँची घाटियों का मिश्रित धरातल है। इसे पहाड़ क्षेत्र भी कहते हैं। इस प्रदेश में महाभारत लेख और महान हिमालय के मध्य नेपाल की प्रमुख काठमाण्डू घाटी स्थित है। यह 24 किमी. लम्बी और 11 किमी. चौड़ी है। यहाँ निम्न हिमालय की श्रेणियाँ है, जो हिमाच्छादित श्रेणियों की ऊँचाई ग्रहण किये हुए हैं। काठमाण्डू और पोखरा घाटी, जो मध्यवर्ती क्षेत्र में स्थित है, समतल बेसिन है। इसका निर्माण नदी व हिमानी द्वारा लाये तलछट से हुआ है। यह क्षेत्र प्लीस्टोसीन युग (लगभग 25,00,000 से 1,00,000 वर्ष पूर्व) का बना है। काठमाण्डू घाटी देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास की धुरी है, जो बाघमती नदी द्वारा अपवाहित है। बाघमती नदी विश्वविख्यात पशुपतिनाथ मन्दिर को स्पर्श करती हुई बहती है।

(4) तराई प्रदेश- इस प्रदेश में मुख्यतः भावर और तराई का क्षेत्र सम्मिलित किया जाता है, जो देश का दक्षिणी भाग है। इस भाग में चूरिया पर्वत श्रेणियाँ फैली हैं जो सवाना घास और सागवान वृक्षों से ढकी हैं। इन श्रेणियों में बीच-बीच में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्वी दिशा में लम्बी घाठियाँ फैली हैं। इन्हें यहाँ दून कहते हैं। इसके दक्षिण में भावर क्षेत्र पाया जाता है जिसमें नदियों द्वारां बहाकर लाया गया अवसाद पाया जाता है। भावर और चूरिया पर्वत श्रेणियों के दक्षिण में तराई का नीचा उपजाऊ मैदान पाया जाता है, जो आगे जाकर गंगा के मैदान से मिल जाता है। यह 32 किलोमीटर चौड़ा है। तराई का उत्तरी भाग बड़ा दलदली है और यहाँ मलेरिया फैला रहता है जबकि दक्षिणी भाग काफी चौड़ा और उपजाऊ है। तराई की जलवायु उष्ण कटिबन्धीय है। पूर्वी और मध्य पश्चिमी क्षेत्रों में 150 सेन्टीमीटर वर्षा होती है। सुदूर पश्चिमी क्षेत्र प्रायः सूखा है, जहाँ वर्षा 75 सेंटीमीटर तक होती है। अधिक वर्षा वाले भागों में गन्ना, जूट, चावल, अनाज और राई बोयी जाती है तथा शुष्क भागों में गेहूँ और मोटे अनाज । इस प्रदेश में ही सबसे अधिक कोसी, कर्नाली, बाघमती, गण्डक और उनकी सहायक नदियाँ बहती हैं। जिनके द्वारा अनेक बाढ़ें आती हैं। ये बाढ़ें उपजाऊ मिट्टी लाकर तराई में बिछा देती हैं। नदियों की दृष्टि से नेपाल का पूर्वी भाग कौशिकी प्रदेश कहलाता है। इस भाग में कोशी नदी अपनी सहायक नदियों के साथ मिलकर अरुण नदी के रूप में गंगा में मिल जाती है। बाघमती नदी मुख्य नेपाल या काठमाण्डू की घाटी में बहती है। इसके पश्चिमी भाग को गण्डकी प्रदेश कहते हैं जिसमें गण्डक अपनी सहायक नदियों के साथ बहती है और त्रिशूली धारा के रूप में गंगा में मिल जाती है। पश्चिम की ओर के भाग को कर्नाली प्रदेश कहा जाता है। इसमें कर्नाली और शारदा आदि अपनी सहायक नदियों के साथ गंगा में मिल जाती है।

नेपाल की जलवायु

नेपाल की जलवायु के सम्बन्ध में सूक्ष्म विश्लेषण जलवायु सम्बन्धी आँकड़ों के अभाव के कारण सम्भव नहीं है। यहाँ की जलवायु की दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ है—ऊँचाई के साथ तापमान एवं जलवायु में परिवर्तन तथा पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा में कमी होना । जैसे-जैसे तराई प्रदेश से उत्तर की ओर जाते हैं तापमान कम होता जाता है। काठमाण्डू, जो समुद्रतल से 1,337 मीटर ऊँचाई पर स्थित है, का जनवरी का औसत तापमान 10° से. और मई का 23° से. होता है। दूसरी ओर उच्च हिमालय की श्रेणियों पर तापमान हिमांक से नीचा रहता है तथा ये श्रेणियाँ वर्ष भर हिमाच्छादित रहती है। वर्षा की मात्रा भारत के मैदान के समान पूर्व से पश्चिम को कम होती जाती है। पूर्वी नेपाल में लगभग 250 सेमी. वर्षा वर्ष में होती है जबकि पश्चिमी नेपाल की वार्षिक वर्षा का औसत 100 सेमी. है। अधिकांश वर्षा जून से सितम्बर के मध्य होती है । शीतऋतु में भूमध्य सागरीय चक्रवातों से थोड़ी वर्षा हो जाती है। देश के पूर्वी भाग में 175 सेमी. तथा पश्चिमी भाग में 75 सेमी. वर्षा होती है। विभिन्न भागों की वर्षा की मात्रा में प्रादेशिक विषमता मिलती है।

नेपाल की जलवायु मानसूनी ही है, लेकिन इस पर ऊँचाई का प्रभाव अत्यधिक पड़ा है, जिसके फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों में पर्याप्त भिन्नता है। तराई के क्षेत्र में उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु मिलती है। पहाड़ों, आन्तरिक घाटियों और हिमालय पर्वतीय अंचलों में उच्चावच पर्वत श्रेणियों की दिशा और ढाल के अनुसार इन दोनों में उपोष्ण कटिबन्धीय से लेकर अल्पाइन दशाएँ मिलती है। नेपाल का ग्रीष्मकाल अत्यधिक सुहावना होता है, अतः विश्व के अनेक भागों से इस समय यहाँ पर्यटक आते हैं।

नेपाल की प्राकृतिक वनस्पति

जलवायु के परिवर्तन के साथ प्राकृतिक वनस्पति में परिवर्तन स्वाभाविक है, अतः ऊँचाई के साथ तापमान में परिवर्तन आता है और उसी प्रकार वनस्पति भी परिवर्तित हो जाती है। नेपाल के 39.1% भाग पर वन हैं। पर्वतीय ढालों पर लगभग 1,500 मीटर की ऊँचाई तक चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार एवं पतझड़ वाले वन मिलते हैं। इनमें साल की लकड़ी बहुतायत से होती है । 1,500 से 2,700 मीटर तक सदाबहार ओक के वन प्रमुखता से मिलते हैं। साथ में मैपल एवं पाइन के वृक्ष भी मिलते हैं। 2,700 से 3,700 मीटर ऊँचाई के क्षेत्रों में कोणधारी वनों का विस्तार है जिनमें फर, लार्च, साइप्रस, स्प्रूस आदि वृक्ष मिलते हैं। इससे अधिक ऊँचाई के क्षेत्रों में आल्पस तुल्य वनस्पति तथा निरन्तर हिमाच्छादित क्षेत्र पाये जाते हैं। काठमांडू की घाटी में घास उगती है। 2,500 मीटर तक छोटी वनस्पति एवं फूलदार पौधे मिलते हैं। इससे अधिक ऊँचाई पर वनस्पति का अभाव है। नेपाल की वन-सम्पदा विशाल है, लेकिन धरातल की दुर्गमता एवं सीमित साधनों से उनका समुचित उपयोग नहीं हो पाया है।

नेपाल की कृषि


कृषि नेपाल का आधारभूत उद्योग है। यहाँ की 74% जनसंख्या खेती में लगी हुई है। काठमाण्डू की घाटी में शताब्दियों से गहरी खेती की जा रही है, लेकिन देश का कुल 16% भाग ही कृषि के अन्तर्गत है। खेती का अधिकांश भाग आर्द्र तराई के मैदानों में विस्तृत है जहाँ देश की कुल कृषि-भूमि का लगभग दो-तिहाई भाग पाया जाaता है। दक्षिणी-पूर्वी तराई में 70% से 80% भाग पर खेती की जाती है। पूर्वी नेपाल का धरातल असमान होने के कारण अधिकतर चरागाहों के लिए उपयुक्त है। यद्यपि पश्चिमी भाग में कृषि के लिए भूमि उपलब्ध है लेकिन वर्षा की अनिश्चितता तथा उसके अभाव में कृषि नहीं की जा सकती है। सिंचाई के साधनों का भी अभाव है। कृषि क्षेत्र के केवल 22% भाग पर ही सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध । कुल कृषि-क्षेत्र के लगभग 56% भाग पर चावल, 25% भाग पर मकई और मोटे अनाज, 7% भाग पर गेहूँ, 5% भाग पर आलू, 3% भाग पर तम्बाकू, 2% भाग पर जूट और शेष भाग पर तिलहन तथा अन्य वस्तुएँ पैदा की जाती हैं। गेहूँ, तम्बाकू, तिलहन और आलू उत्पादन-क्षेत्रों में दो फसलें प्राप्त की जाती हैं। सम्पूर्ण भूमि में से 3 लाख हैक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है। 49 लाख हैक्टेयर पर वन-प्रदेश फैले हैं और 24 लाख हैक्टेयर भूमि हिमाच्छादित है।

तराई के पूर्वी उष्ण और तर प्रदेश नेपाल के मुख्य कृषि क्षेत्र हैं। इस भाग में मानसूनी वर्षा के कारण दो या तीन फसलें तक प्राप्त की जाती हैं। यहाँ चावल, जूट और गन्ना पैदा किया जाता है। आन्तरिक हिमालय की उपजाऊ काठमाण्डू की घाटी में 1,330 से 1,500 मीटर की ऊँचाई पर रपजाऊ गहरी मिट्टी पायी जाती है, अत: यहाँ गहरी खेती की जाती है। काठमाण्डू और पोखर घाटियाँ न केवल अधिक उपजाऊ और घनी बसी हैं बल्कि ये ही क्षेत्र नेपाल की राजनीति में भी सबसे अधिक महत्त्व रखते हैं। महान हिमालय में 3,600 मीटर की ऊँचाई तक आलू पैदा किया जाता है तथा ढालों पर पशु चारण होता है।

चाय, कपास, तम्बाकू आदि भी यहाँ पैदा किये जाते हैं। घाटी में नांरगी, केला और पूर्वी पहाड़ियों पर इलायची पैदा होती है। नेपाल में कृषि के विकास में मुख्य बाधाएँ—भूमि, वर्षा है

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