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भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव का वर्णन कीजिए

18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत की राजनीतिक दुर्बलता का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली। ब्रिटिश शासन की स्थापना के फलस्वरूप भारतवासियों को पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के सम्पर्क में आने का अवसर मिला। 19वीं शताब्दी के आरम्भ तक भारतीय संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति से पूर्णतः प्रभावित हो गई थी। पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय संस्कृति को प्रत्येक क्षेत्र में प्रभावित किया।

Western influence on Indian culture

भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव

(I) सामाजिक जीवन पर पाश्चात्य प्रभाव-

1. सामाजिक क्षेत्र में जागृति- पाश्चात्य सभ्यता तथा संस्कृति के प्रभाव से भारतीय समाज में एक क्रांति उत्पन्न हो गई। एक ओर रूढ़िवादी लोगों ने भारतीय सामाजिक जीवन पर पाश्चात्य प्रभाव को रोकने पर बल दिया और सभी प्रकार की प्रगति का विरोध किया तथा प्राचीन परम्पराओं के पालन पर ही बल दिया। दूसरी ओर प्रगतिशील लोगों ने बाल-विवाह, बहु-विवाह, पर्दा प्रथा, सती-प्रथा, छुआछूत आदि सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया तथा पश्चिम की अच्छी बातों को ग्रहण करने पर बल दिया। इससे सामाजिक क्षेत्र में जागृति उत्पन्न हुई ।

2. समानता-पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति में जाति-प्रथा और ऊँच-नीच के भेदभाव को कोई स्थान प्राप्त नहीं था। इसका भी भारतीय समाज पर काफी प्रभाव पड़ा। भारतवासियों को भी जाति-प्रथा, ऊँच-नीच के भेदभाव तथा छुआछूत आदि का परित्याग करने की प्रेरणा मिली। उन्हें भी एक ऐसे प्रगतिशील समाज के निर्माण की प्रेरणा मिली जिसमें मानव-समाज के बीच समानता और भाईचारे की भावना हो तथा जिसमें जाति-प्रथा के बन्धनों तथा ऊँच-नीच के भेदभाव को कोई स्थान प्राप्त न हो।

3. मध्यम वर्ग का उदय-पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के सम्पर्क के फलस्वरूप समाज में एक नवीन मध्यम वर्ग का उदय हुआ। इस नवीन मध्यम वर्ग के लोग अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति के समर्थक थे तथा सामाजिक कुरीतियों एवं धार्मिक पाखण्डों का निवारण कर एक प्रगतिशील समाज का निर्माण करना चाहते थे। ये लोग परम्परागत रूढ़ियों, जाति-प्रथा के बन्धनों एवं छुआछूत की विचारधारा के विरोधी थे तथा सुधारवादी आन्दोलन के समर्थक थे। राजा राममोहन राय इसी वर्ग के प्रमुख प्रतिनिधि थे जो भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत कहलाए। इस वर्ग ने समाज और देश की काया पलट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

4. समाज सुधार-पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव के फलस्वरूप भारत में समाज सुधार आन्दोलनों को प्रोत्साहन मिला। बाल-विवाह, बहु-विवाह, सती-प्रथा, कन्या वध, पर्दा-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों के निवारण के लिए आन्दोलन शुरू हुए। सामाजिक सुधारों की प्रेरणा पश्चिम के प्रभाव का ही परिणाम है। अखिल भारतीय महिला परिषद् ने भारतीय महिलाओं के उत्थान के लिए देशव्यापी आन्दोलन किया। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द आदि ने भारतीय नारियों की दशा सुधारने पर बल दिया।

राजा राममोहन राय ने सती-प्रथा के विरुद्ध प्रबल आवाज उठाई। अन्त में 1829 ई. में भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने सती-प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा-विवाह के लिए आन्दोलन किया। 1856 ई. में अंग्रेजी सरकार ने विधवा-विवाह को कानूनी रूप दे दिया। इसी प्रकार शिशु-वध और दास प्रथा को अवैध घोषित किया गया।

5. वैज्ञानिक दृष्टिकोण-पाश्चात्य सभ्यता ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुसंधान की प्रवृत्ति पर अत्यधिक बल दिया था। पाश्चात्य देशों के नागरिक स्वतन्त्र चिन्तन के पोषक थे तथा अपनी सामाजिक एवं धार्मिक समस्याओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाधान करते थे। अतः भारतवासी भी पाश्चात्य सम्पर्क के कारण अपनी समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हल करने का प्रयास करने लगे। बी.एन. लूनिया का कथन है-“पश्चिम ने हमें वैज्ञानिक अन्वेषण और अनुसंधान की भावना, प्रयोग की प्रणाली और साहसिक कार्य करने की क्षमता प्रदान की। पश्चिम से ही हमने नवीन ज्ञान-विज्ञान और सत्य की खोज करने की प्रबल उत्कण्ठा एवं जीवन के आन्तरिक रहस्यों को समझ लेने की शक्ति प्राप्त की।’

6. रहन-सहन, आचार-विचार आदि का प्रभाव-पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति ने हमारी वेश-भूषा, खान-पान, आचार-विचार, शिष्टाचार-व्यवहार आदि को अत्यधिक प्रभावित किया है। पश्चिम ने जीवन का और चरित्र का एक नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न कर दिया है। व्यक्तिवाद, सन्देहवाद और क्रांति की एक नवीन लहर समाज में दौड़ रही है। संयुक्त हमारे सामाजिक बन्धन ढीले पड़ गए हैं। परिवार-प्रथा एवं जाति-प्रथा का प्रभाव क्षीण हो रहा है। व्यक्तिवाद पर अधिक जोर दिये जाने से

(II) धार्मिक जीवन पर प्रभाव-

1. ईसाई धर्म का प्रचार-भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के पश्चात् ईसाई धर्म प्रचारकों ने योजनाबद्ध तरीके से ईसाई धर्म का प्रचार करना शुरू किया। हजारों हिन्दुओं को मलोभन एवं दबाव के द्वारा ईसाई बनाया गया। अंग्रेजी सरकार की नौकरियों के आकर्षण से बहुत से असन्तुष्ट भारतीयों ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। कुछ शिक्षित भारतीय हिन्दू धर्म की कुरीतियों होकर भी ईसाई बने। ईसाई धर्म के बढ़ते हुए प्रभाव के विरुद्ध धर्म सुधार आन्दोलन शुरू हुए। स्वामी दयानन्द ने हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता को स्थापित किया और वेदों की ओर वापस लौटने को कहा। आर्य समाज ने शुद्धि आन्दोलन के माध्यम से धर्म-परिवर्तित लोगों को हिन्दू धर्म में वापस लिया।

2. धर्म सुधार आन्दोलन- पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव के फलस्वरूप भारतीयों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्वतन्त्र चिन्तन और प्रगतिशील विचार उत्पन्न हुए। उन्हें अपनी परम्परागत रूढ़ियों, सामाजिक कुरीतियों एवं धार्मिक कर्मकाण्डों की निरर्थकता का ज्ञान हुआ। उनका ध्यान अपने देश की पिछड़ी हुई दशा, अज्ञानता एवं कुरीतियों की ओर गया जिससे भारत में धर्म एवं समाज के क्षेत्र में अनेक सुधार आन्दोलनों को प्रोत्साहन मिला ।

बी.एन. लूनिया लिखते हैं कि “अन्धविश्वास और श्रद्धा का स्थान बुद्धि और तर्क ने ले लिया एवं उदारता तथा स्वतन्त्र विचार कट्टरता तथा शास्त्रवाद पर विजयी होने लगे। प्राचीन विश्वासों, परम्पराओं और सिद्धान्तों को विज्ञान के तर्क और समालोचना की कसौटी पर उतारा गया और उनमें से अनेक की निन्दा करके उन्हें त्याग दिया गया।” अनेक भारतीयों को हिन्दू धर्म ढकोसला मात्र दिखाई देने लगा और उन्होंने पश्चिम की अनेक बातों के साथ-साथ ईसाई धर्म की भी ग्रहण कर लिया। आगे चलकर ईसाई धर्म के बढ़ते हुए प्रभाव पर अंकुश लगाने के लिए राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि ने आन्दोलन शुरू किए।

(III) आर्थिक जीवन पर प्रभाव-

पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति ने भारत के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित किया। अंग्रेजों की आर्थिक और व्यापारिक नीति के कारण भारत के प्राचीन उद्योग-धन्धे नष्ट हो गये और देश कृषि-प्रधान हो गया। परन्तु जनसंख्या की वृद्धि और नवीन उद्योग-धन्धों के अभाव से कृषि जीवन-निर्वाह का समुचित साधन न हो सकी। इससे नवीन आर्थिक समस्याओं का जन्म हुआ। गाँवों के लोग नए-नए धन्धों की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे। इसका एक बुरा परिणाम यह हुआ कि बड़े शहर गरीब मजदूरों से भर गए जिनके जीवन और रहन-सहन का स्तर बहुत ही गिरा हुआ था। इसी बीच जापान, जर्मनी, अमेरिका के पूँजीवाद और औद्योगीकरण ने भारतीयों में जागृति उत्पन्न की। भारतीयों को भी अपने देश के औद्योगीकरण की प्रेरणा मिली। पाश्चात्य प्रभाव के फलस्वरूप देश में धीरे-धीरे नये उद्योगों और व्यवसायों की स्थापना हुई और औद्योगीकरण की ओर ठोस कदम उठाये जाने लगे। इसके फलस्वरूप रहन-सहन के स्तर में सुधार हुआ। अब भारतीयों को अपनी गरीबी और आर्थिक हीनता अधिक अखरने लगी। इन्हें दूर करने के लिए और आर्थिक उन्नति के लिए प्रयास किये जाने लगे। गाँवों में कृषि की उन्नति के साथ-साथ नगरों में उद्योगों की भी उन्नति होने लगी। इससे हमारे आर्थिक जीवन का आधुनिकीकरण होने लगा। 1917 की रूस की क्रान्ति ने भारतवासियों को बड़ा प्रभावित किया। अब भारतवासी साम्यवाद और समाजवाद की ओर झुकने लगे। श्रम-आन्दोलन और किसानों की गतिविधियाँ शुरू हो गई।

(IV) शिक्षा पर प्रभाव-

पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति का सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा पर पड़ा। ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा जो अंग्रेजी शिक्षा प्रारम्भ की गई उसे मैकाले तथा हार्डिंग ने अधिक प्रोत्साहन दिया। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों ने पाश्चात्य संस्कृति को अपना लिया जिससे नवीन मध्य वर्गों का प्रादुर्भाव हुआ।

(V) देशी भाषाओं के साहित्य पर प्रभाव-

पाश्चात्य संस्कृति एवं शिक्षा ने भारतीय साहित्य को भी बहुत प्रभावित किया। यद्यपि भारत के प्राचीन जीवन और साहित्य में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध बना रहा किन्तु देशी भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ नमूने, भावना, दृष्टिकोण, साहित्यिक युक्तियों, साधनों तथा विषय के निर्वचन तथा प्रतिपादन में पाश्चात्य ही रहे। उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण की। भारतीयों को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से देशी तथा विदेशी साहित्य का अध्ययन करने का अवसर मिला जिससे देशी भाषाओं के साहित्य पर पाश्चात्य संस्कृति का गम्भीर प्रभाव पड़ा। हमारे राजनीतिक नेता भी पाश्चात्य संस्कृति के आधार पर ही भाषण देते थे। अंग्रेजी ग्रन्थों ने भारतीयों के सम्मुख नवीन विचारधाराएँ प्रस्तुत कीं। भारतीय साहित्यिकों ने अंग्रेजी साहित्य का अनुकरण किया। हमारा गद्य-साहित्य प्रायः अंग्रेजी साहित्य के अनुवाद से ही प्रारम्भ होता है। यहाँ के साहित्यिकों ने पाश्चात्य आदर्शों के अनुकूल ही लेख लिखे। उन्होंने पाश्चात्य कथानक साहित्य का अनुकरण किया। भारतीय नाटकों पर पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। इब्सन, शेक्सपीयर, बर्नार्ड शा आदि पाश्चात्य नाटककारों की शैली का अनुकरण भारतीय नाटककारों ने किया। आधुनिक एकांकी नाटक एवं समस्या नाटक पाश्चात्य नाटक साहित्य के प्रभाव का स्पष्ट फल है। लक्ष्मीनारायण मिश्र, गोविन्द बल्लभ पन्त, अश्क, प्रेमी, उदयशंकर भट्ट, कैलाशनाथ भटनागर, सेठ गोविन्द दास आदि नाटककारों के नाटकों में पाश्चात्य नाट्य साहित्य का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। छोटी-छोटी कहानियों एवं उपन्यासों में भी पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। समालोचना में भी पाश्चात्य तत्वों को अपनाया गया। काव्य के क्षेत्र में भी पाश्चात्य साहित्य की छाप लगी। अंग्रेजी सोनेट (Sonnet), ओड (Ode) आदि के अनुकरण से चतुर्दशपदियाँ और सम्बोधन गीत लिखे गये। अतुकान्त कविताएँ (Blank verse) भी खूब लिखी गई। अंग्रेजी गीतों (lyrics) का भी खूब अनुकरण किया गया । प्रेम-गीतों एवं छायावादी कविताओं में अंग्रेजी-शैली का अनुकरण किया गया। अंग्रेजों ने जन-जन तक बाइबिल के सिद्धान्तों को पहुँचाने के लिए देशी भाषा के टाइप निर्माण किए, मुद्रणालय खोले। देशी भाषाओं में समाचार-पत्र भी निकलने लगे। 1780 ई. में की (Key) ने प्रथम अंग्रेजी पत्र बंगाल समाचार प्रकाशित किया। उसका अनुकरण करके 1816 ई. में देशी भाषा में ‘बंगाल समाचार’ प्रकाशित हुआ। 1822 ई. में ‘बम्बई समाचार’, 1845 में ‘बनारस अखबार’ प्रकाशित किया गया। अंग्रेजी भाषा द्वारा ही संस्कृत भाषा का पुनरुद्धार हुआ । संस्कृत सीखने वाला प्रथम अंग्रेज चार्ल्स विलकिंस था और संस्कृत का समुचित महत्व समझने वाला सर विलियम जोन्स था। उसने पूर्वी ज्ञान-विज्ञान की खोज करने के लिए बंगाल एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की थी। विलकिन्स विलियम, कोल बुक, विल्सन विलियन्स, मैक्समूलर आदि विद्वानों ने संस्कृत का अध्ययन किया। प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थों का संकलन किया और भारतीयों का ही नहीं अपितु विश्व के लोगों का ध्यान संस्कृत की ओर आकृष्ट किया ।

(VI) भारतीय राजनीति पर पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव-

राजनीतिक क्षेत्र में पाश्चात्य सभ्यता का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। वैधानिक नियमों की भावना, स्वतन्त्रता, समानता आदि की प्रेरणा मिली। पाश्चात्य प्रभाव से ही भारत में राष्ट्रीय चेतना व जागृति का विकास हुआ। वाशिंगटन, क्रामवेल, मेजिनी, गेरीबाल्डी, नेपोलियन आदि से हमने राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीयता के लिए प्रेरणा ली। अंग्रेजी शासन की समानता, शान्ति, एकता

और शासन-विधान के विकास तथा पाश्चात्य राजनैतिक सिद्धान्तों से हमारे देश में लोकतन्त्र तथा प्रजातान्त्रिक संस्थाओं पर अधिकाधिक जोर दिया जाने लगा। इसके अतिरिक्त साम्यवाद, समाजवाद, व्यक्तिवाद आदि पाश्चात्य राजनीतिक सिद्धान्तों को भी भारतीयों ने अपना लिया।

(VII) वैज्ञानिक अनुसंधान एवं अन्वेषण की भावना-

मध्ययुग में भारत की वैज्ञानिक अन्वेषण की भावना और अनुसन्धान की भावना का अन्त हो गया था। पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के सम्पर्क में आकर भारतीयों ने अनुभव किया कि पश्चिम की अभूतपूर्व उन्नति का प्रमुख कारण जिज्ञासा की उन्नति है। अतः भारतीयों ने पश्चिमी अन्वेषण, तर्क और विचार करने की वैज्ञानिक तथा विवेकशील प्रणाली को अपनाया, इसके परिणामस्वरूप भारतीय शिक्षण संस्थाओं में वैज्ञानिक विषयों के शिक्षण की समुचित व्यवस्था की गई और वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए विभिन्न संस्थाओं तथा प्रयोगशालाओं की स्थापना हुई जिनमें बंगलौर के इण्डियन इन्स्टीट्यूट आफ साइन्स का नाम उल्लेखनीय है।

(VIII) भारतीय-ललित कलाओं पर प्रभाव-

पश्चिम के प्रभाव से ही भारतीयों को अपने अतीत की ललित-कलाओं का ज्ञान प्राप्त हुआ। भारतीय ललित-कलाओं को हम पूर्णतया विस्मृत कर चुके थे। सिस्टर निवेदिता, हैवेल, फर्ग्यूसन, आदि पाश्चात्य विद्वानों ने भारत की ललित-कलाओं के प्रमुख तत्वों, प्रवृत्तियों एवं कलात्मक अभिव्यंजना को विश्व के सम्मुख रखा। कार्मेघम, कुमार स्वामी, मार्शल, पर्सी ब्राउन, स्मिथ, टॉड, मैक्समूलर आदि ने भारत के अतीत के गौरव का अपने ग्रन्थों में वर्णन किया।

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