WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियों के वितरण का विवरण दीजिए तथा बताइए कि कृषि की दृष्टि से इनका क्या महत्त्व है ?

मिट्टियाँ (Soils) – किसी भी देश के भौगोलिक अध्ययन में मिट्टियों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की कृषि पूर्णतः मिट्टियों के उपजाऊपन पर टिकी हुई है। मिट्टियों का निर्माण जलवायु और चट्टानों के विखण्डन से होता है जिनमें अनेक प्रकार के रासायनिक तत्त्व पाये जाते हैं ।

डॉ. बैनेट के अनुसार, “मिट्टी भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत है जो मूल चट्टानों या वनस्पति के योग से बनती है। इसका निर्माण जलवायु और चट्टानों के विखण्डन से होता है ।”

मिट्टी मानव के लिये प्राकृतिक सम्पत्ति के रूप में अत्यन्त मूल्यवान है। मानवीय सभ्यता का इतिहास मिट्टी से ही आरम्भ होता है। प्राचीन सभ्यता का जन्म-स्थान उपजाऊ मिट्टी वाली सिन्धु नदी की घाटी रही है। यदि किसी देश की मिट्टी उर्वर है तो वह समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था तथा अधिक जनसंख्या के पोषण में समर्थ होती है। इसके विपरीत अनुपजाऊ मिट्टी वाले देश की अर्थव्यवस्था निराशाजनक होती है। ऐसे क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व तथा जीवन स्तर दोनों ही निम्न होते हैं ।

भारत

भारत एक विशाल देश है। इस कारण यहाँ के प्रदेशों में सर्वत्र एक-सी मिट्टी नहीं मिलती है। यहाँ की मिट्टियों को प्रदेशों के अनुसार तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-


(i) हिमालय प्रदेश की पथरीली मिट्टियाँ—(क) कंकड़ तथा पत्थर युक्त, (ख) चूने वाली ।

(ii) सतलज-गंगा के मैदान की मिट्टियाँ—(क) कच्छारी मिट्टी (1) पुरातन कच्छारी, (2) नवीन कच्छारी तथा (3) नवीनतम कच्छारी, (ख) डेल्टा प्रदेश की चिकनी मिट्टी, (ग) रेह मिट्टी, (घ) मरुस्थलीय बलुई मिट्टी ।

(iii) दक्षिण भारत की मिट्टियाँ—(क) काली मिट्टी, (ख) लाल मिट्टी, तथा (ग) लेटेराइट मिट्टी ।

(iv) अन्य मिट्टियाँ-नमकीन या क्षारीय मिट्टियाँ ।

नवीन वर्गीकरण

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली के अनुसार भारत की मिट्टियों का वर्गीकरण निम्नलिखित है- (1) लाल मिट्टी, (2) काली मिट्टी, (3) लैटेराइट मिट्टी, (4) क्षार युक्त मिट्टी, (5) काँप मिट्टी, (6) हल्की काली एवं दलदली मिट्टी, (7) रेतीली मिट्टी तथा (8) वनों वाली मिट्टी ।

मिट्टियों का वर्गीकरण

भारत की मिट्टियों को सामान्यतया चार वर्गों में विभाजित किया जाता है, जो निम्न प्रकार है—(1) जलोढ़ मिट्टी, (2) काली मिट्टी, (3) लाल व पीली मिट्टी, तथा (4) लैटराइट मिट्टी ।

इसके अतिरिक्त तीन अन्य प्रकार की मिट्टी भी हैं— (5) मरुस्थलीय मिट्टी, (6) लवणीय व क्षारीय मिट्टियाँ, तथा (7) पर्वतीय मिट्टी |

इसका विस्तृत विवरण इस प्रकार है-

(1) जलोढ़ या काँप मिट्टी — यह बहुत महत्त्वपूर्ण मिट्टी है। भारत के काफी बड़े क्षेत्र में यह मिट्टी पाई जाती है। इसके अन्तर्गत देश का 40 प्रतिशत भाग सम्मिलित है। वास्तव में सम्पूर्ण उत्तरी मैदान में यह मिट्टी पाई जाती है। यह मिट्टी हिमालय से निकलने वाली तीन बड़ी नदियों— सतलज, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाई गई है और उत्तरी मैदान में जमा की गई है। राजस्थान में भी इस मिट्टी की एक पट्टी है।

यह गुजरात के मैदानों में भी मिलती है। जलोढ़ मिट्टी पूर्वी तटीय मैदानों, विशेष रूप से महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेश में भी सामान्य रूप से मिलती है।

हजारों वर्षों तक सैकड़ों किमी. दूरी तय करते हुए नदियों ने अपने मुहानों पर मिट्टी के बहुत बारीक कणों को जमा किया है। मिट्टी के इन बारीक कणों को जलोढ़क कहते हैं ! इस मिट्टी में विभिन्न मात्रा में रेत, गाद तथा मृत्तिका (चीका मिट्टी) मिली होती है।

यह तटीय मैदानों तथा डेल्टा प्रदेशों में व्यापक रूप से फैली है। जैसे ही हम नदियों के ऊपरी भागों की ओर बढ़ते हैं तो इस मिट्टी के कुछ कण दिखाई पड़ते हैं। नदियों के ऊपरी भागों में अर्थात् इनके उद्गम स्थानों के निकट इस मिट्टी के कण और अधिक मोटे होते हैं। इस प्रकार की मिट्टी गिरिपाद मैदानों में बहुत पाई जाती है । पर्वतों के निकटवर्ती मैदानों को गिरिपाद मैदान कहते हैं।

कणों के आकार के अलावा इस मिट्टी का वर्णन इसकी आयु के आधार पर भी किया जाता है । यह प्राचीन जलोढ़क और नवीन जलोढ़क दो प्रकार की होती है। प्राचीन जलोढ़क में प्रायः कंकड़ होते हैं तथा इसकी अवमृदा में कैल्सियम कार्बोनेट होता है। नवीन जलोढ़क प्राचीन जलोढ़क की अपेक्षा अधिक उपजाऊ होती है ।

जलोढ़ मिट्टियाँ सामान्यतः सबसे अधिक उपजाऊ होती हैं। इनमें साधारणतया पोटाश, फास्फोरिक अम्ल तथा चूना पर्याप्त मात्रा में होता है। लेकिन इनमें नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है। शुष्क प्रदेशों में इनमें क्षारीय अंश अधिक होता है। भारत की लगभग आधी जनसंख्या का भरण-पोषण इसी मिट्टी में उपजे खाद्यान्नों से होता है ।

जलोढ़ मिट्टी की विशेषताएँ

(2) काली मिट्टी—इस मिट्टी को रेगड़ मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी का रंग काला होता है, इसलिये इसे काली मिट्टी कहते हैं। यह मिट्टी कपास की फसल के लिये बहुत उपयुक्त है । अतः इसे कपास वाली मिट्टी भी कहा जाता है। यह मिट्टी दक्कन ट्रेप प्रदेश की प्रमुख मिट्टी है। इस प्रदेश का विस्तार दक्कन के पठार के उत्तर-पश्चिमी भागों में है। इसका निर्माण लावा के प्रवाह से हुआ है। महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों में यह मिट्टी पाई जाती है।

इस मिट्टी का विस्तार दक्षिण में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों की घाटियों में भी है । मूल चट्टानी पदार्थों के साथ-साथ जलवायु की दशाएँ भी इस मिट्टी के निर्माण में महत्त्वपूर्ण रही हैं। इसलिये इनका विस्तार लावा के पठार के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी है। यह लगभग 5 लाख किमी. में फैली है।
काली मिट्टी के बहुत से क्षेत्र अति उपजाऊ हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में, विशेष रूप से पठारी क्षेत्रों में, मिट्टी अपेक्षाकृत कमजोर है।

ढलानों पर ये मिट्टियाँ कुछ रेतीली हैं तथा पठारी भूमि पर अच्छी वर्षा होने के कारण उपजाऊ हैं। पहाड़ियों और मैदानों के बीच के हिस्सों में ये मिट्टियाँ अधिक काली, गहरी और उपजाऊ हैं। पहाड़ियों से पानी के साथ बहकर आने वाली सामग्री जमा होते रहने के कारण इनकी उर्वरता निरन्तर बढ़ती रहती है। वैसे उच्च क्षेत्रों की काली मिट्टी की उर्वरता, निम्न स्थलों की काली मिट्टी की अपेक्षा कम रहती है।

काली मिट्टी का निर्माण बहुत ही महीन मृत्तिका (चीका) के पदार्थों से हुआ है। इसकी अधिक समय तक नमी धारण करने की क्षमता प्रसिद्ध है। इसमें मिट्टी के पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। कैल्सियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम कार्बोनेट, पोटाश और चूना इसके मुख्य पोषक तत्त्व हैं। इस मिट्टी में सामान्यतया फास्फोरिक तत्त्वों की कमी होती है। गर्म मौसम में इस मिट्टी के खेतों में गहरी दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों से इसके वायु मिश्रण में सहायता मिलती है। पहली बौछार के तुरन्त बाद इसमें जुताई करना आसान होता है, अन्यथा चिपचिपी हो जाने पर इसे जोतना कठिन हो जाता है। इस मिट्टी में कपास के अतिरिक्त मूँगफली, तम्बाकू, ज्वार-बाजरा की फसलें भी उगाई जाती हैं।

काली मिट्टी की विशेषताएँ

इसका रंग गहरा काला और इसके कणों की बनावट घनी होती है। दक्षिण की पहाड़ियाँ और पठारी ढालों पर यह मिट्टी कम उपजाऊ, हल्की और बड़े छेदों वाली होती है, जिसमें जल अधिक समय के लिए ठहर नहीं पाता । अतः इसमें केवल ज्वार, बाजरा, रागी या दालें पैदा की जाती हैं। किन्तु निम्न भूमि पर यह मिट्टी गहरी और अधिक काली होती है।

इस मिट्टी में चूना, पोटाश, मैग्नीशियम तथा लोहा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है किन्तु फास्फोरस, नाइट्रोजन तथा जीवांशों का अभाव पाया जाता है। परीक्षणों के अनुसार इस मिट्टी में घुलनशील अंश 68.71%, लौह-ऑक्साइड 11.24%, एल्यूमिना 9.39%, जल तथा जीवांश 5.83%, चूना 1.81% और मैग्नीशियम 1.79% होते हैं।

(3) लाल व पीली मिट्टी-दक्षिणी भारत के अधिकांश भू-भाग पर इनका विस्तार मिलता है। यह लगभग 8 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र घेरे हुए हैं। ग्रेनाइट, नीस और शिष्ट जैसी प्राचीनतम परिवर्तित चट्टानों की टूट-फूट से लाल मिट्टी का निर्माण हुआ है। यह हल्की कंकरीली होती है। इसका रंग कहीं-कहीं भूरा, चाकलेटी, पीला व काला भी हो गया है। यह मिट्टी दक्षिण भारत की मिट्टी है ।

बंगाल के संथाल परगना और छोटा नागपुर पठार, पश्चिमी बंगाल के पश्चिमी जिले – बाकुड़ा, वीरभूमि व मिदनापुर जिले, मेघालय, तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिणी-पूर्वी महाराष्ट्र, पश्चिमी-दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के झाँसी, ललितपुर, मिर्जापुर, हमीरपुर और बाँदा जिलों में लाल मिट्टी मिलती है।

इन मिट्टियों में नाइट्रोजन, फास्फोरस व गलित जीवांश की कमी पाई जाती है। काली मिट्टी की तुलना में इनमें चूना, पोटाश व लोहा ऑक्साइड की मात्रा पाई जाती है। इनमें रंग की विभिन्नता लोहे के अंश में विभिन्नता के कारण होती है। इस विभिन्नता पर और भी रासायनिक पदार्थों के मिश्रण का प्रभाव पड़ता है। पठारी भागों में ये मिट्टियाँ कमजोर, पतली, कंकरीली व हल्के रंग की होती हैं। निम्न मैदानों और घाटियों में पाई जाने वाली लाल मिट्टियाँ अधिक उपजाऊ, गहरी और गहरे रंग की होती हैं।

इस मिट्टी पर विविध फसलें, जैसे ज्वार-बाजरा आदि उगाये जाते हैं। अच्छी फसलें उगाने के लिये उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। निम्न भूमियों की गहरे लाल रंग की मिट्टी अधिक गहरी और उपजाऊ होती है। इसमें सिंचाई की सहायता से गन्ना, कपास, गेहूँ, दालें, मोटे अनाज,रागी, तम्बाकू और साग-सब्जियाँ उगाई जाती हैं।

लाल व पीली मिट्टी की विशेषताएँ

अनेक प्रकार की चट्टानों से बनी होने के कारण लाल-पीली मिट्टी विभिन्न गहराई वाली और उर्वरा शक्ति में बहुत तरह की होती है। ये मिट्टियाँ अत्यन्त रंध्रयुक्त होती हैं और अत्यन्त बारीक तथा गहरी होने पर ही उपजाऊ होती हैं । अतः शुष्क ऊँचे मैदानों में पाई जाने वाली मिट्टी उपजाऊ नहीं होती। यहाँ पर यह हल्के रंग की, पथरीली और कम गहरी होती है। इसमें बालू के समान मोटे कण पाये जाते हैं। अतः इस मिट्टी में केवल बाजरा ही पैदा होता है, किन्तु निम्न भूमियों की लाल मिट्टी गहरे रंग की और अधिक गहरी तथा उपजाऊ होती है।

इसमें कपास, गेहूँ, दालें, मोटे अनाज पैदा किए जाते हैं। इस मिट्टी में लोहा, एल्यूमीनियम और चूना यथेष्ट मात्रा में होता है किन्तु नाइट्रोजन, फास्फोरस और जीवांश कम होता है । इस मिट्टी में अघुलनशील तत्व 90.47%, लोहा 3.51%, एल्यूमीनियम 2.92%, जीवांश और जल 1.01%, मैग्नीशियम 0.70%, चूना 0.56%, कार्बन डाइ-ऑक्साइड 0.30%, पोटाश 0.30%, सोडा 0.12%, फास्फोरस 0.09% तथा नाइट्रोजन 0.08% होती है।

Leave a Comment