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भूमध्य सागरीय कृषि के भौगोलिक वितरण, विशेषताओं तथा समस्याओं का विश्लेषण कीजिए।

स्थिति एवं विस्तार- भूमध्य सागरीय प्राकृतिक प्रदेश विषुवत् (भूमध्य रेखा) के दोनों तरफ 30° अक्षांश से 45° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर पाया जाता हैं। इसका सर्वाधिक विस्तार भूमध्य सागर के तट पर है जिसमें स्पेन, द. फ्रांस, इटली, टर्की, सीरिया, लेबनान, इजराइल, मोरक्को, अल्जीरिया तथा ट्यूनीशिया के तटीय प्रदेश व दक्षिणी अमेरिका में अन्तरीप प्रान्त, उत्तरी अमेरिका में कैलीफोर्निया, द. अमेरिका में चिली का मध्य भाग और आस्ट्रेलिया का दक्षिणी-पूर्वी तथा दक्षिणी-पश्चिमी भाग, द.प. अफ्रीका आदि प्रदेश भूमध्य सागरीय जलवायु में शामिल हैं। ये स्थान स्थल के 2 प्रतिशत भाग पर विस्तृत हैं, परन्तु विश्व की 5 प्रतिशत जनसंख्या को अपने में समेटे हुए हैं।

भौगोलिक परिस्थितियाँ (Geographical Conditions)

1. यहाँ जाड़ों में वर्षा और ग्रीष्म ऋतु शुष्क रहना मुख्य विशेषता है।

2. गर्मियाँ लम्बी व शुष्क होती हैं।

3. वर्षा का औसत 10 से 30 इंच के मध्य होता है और वर्षा की मात्रा में प्रादेशिक अन्तर पाया जाता है। समुद्रों के समीप एवं पर्वतों पर वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। वर्षा निरन्तर परिवर्तनशील है। इसका प्रभाव कृषि पर रहता है।

4. मैदानों में हिमपात नहीं होता है। निकटवर्ती पर्वतों पर हिमपात होने से नदियों में भी पर्याप्त जल रहता है, जो सिंचाई के काम में आता है। पाला और कोहरा अधिक नहीं पड़ता है। 5. जाड़े का तापमान पर्याप्त ऊँचा होता है, नमीयुक्त वायु, बदली तथा सुहावना मौसम रहता । वर्षा रुक-रुक कर होती रहती है। औसत तापमान शीत ऋतु में 40°-50° फा. तथा ग्रीष्म ऋतु में 60°-70° फा. के मध्य रहता है। गर्मी का औसत तापमान 36° सेन्टीग्रेड तक होता है। जाड़े के तापमान गिरकर 0° सेन्टीग्रेड से भी नीचा हो जाता है।

6. दैनिक तापान्तर अधिक होता है, परन्तु वार्षिक तापान्तर कम होता है।

7. ग्रीष्म ऋतु में यहाँ व्यापारिक पवनें चलती हैं जो शुष्क एवं उष्ण होती है और वर्षा नहीं करती, परन्तु शीत ऋतु में पश्चिम की ओर से नमीयुक्त पछुआ हवाएँ चलती हैं जो वर्षा करती है।

8. भूमध्य सागरीय जलवायु वाले प्रदेशों में धरातलीय बनावट में बहुत असमानता पायी जाती है। अधिकतर भाग पठारी एवं पहाड़ी है। केवल नदियों की घाटियों में अपेक्षाकृत विस्तृत मैदान मिलते हैं। यहीं अधिकांश कृषि प्रदेश हैं और सघन जनसंख्या पाई जाती है।

9. धरातलीय बनावट में असमानता के फलस्वरूप मिट्टी में भी स्थानीय अंतर पाया जाता है। नदियों की घाटियों में जलोढ़ उर्वर मिट्टी पाई जाती है।

वनस्पति (Vegetation)

उपर्युक्त प्राकृतिक/भौगोलिक परिस्थितियों के प्रभाव के कारण यहाँ की वनस्पति में सदाबहार रहने का गुण उत्पन्न हो गया है। यद्यपि कुछ वृक्ष गर्मियों के दिनों में पत्ते भी गिरा देते हैं। ग्रीष्म ऋतु में शुष्क वातावरण से सुरक्षा के लिए प्रकृति ने यहाँ के वृक्षों की पत्तियों को रूएँदार तथा सुईदार बना दिया है और तनों के बक्कल को बहुत मोटा कर दिया है। यहाँ पर प्राकृतिक वनस्पति दो प्रकार की पाई जाती है-

(i) जंगल-जहाँ पर अधिक वर्षा होती है वहाँ पर जंगल पाए जाते हैं। रसदार फलों के बगीचों में विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष पाए जाते हैं।

(ii) झाड़ियाँ—कम वर्षा वाले भागों में विभिन्न प्रकार की झाड़ियाँ पाई जाती हैं। जैसे-फ्रांस में गैरिज, इटली व कर्मिका में मैक्विय मुख्य है। अन्य पौधे लैवेण्डर, क्रीम, ओलिण्डर, लोरिल तथा पाम हैं ।

मानव जीवन का स्तर (Level of Human Life)

फलस्वरूप इन प्रदेशों को ‘प्रयास के क्षेत्र’ (Regions of Effort) कहा गया है। ये क्षेत्र विश्व मानव विकास तथा कार्यकलाप के लिए भूमध्य सागरीय जलवायु अति उत्तम है। इसी के की प्राचीनतम सभ्यताओं के केन्द्र रहे हैं। यहीं पर मिस्र, यूनान, बेबीलोनिया तथा रोम की सभ्यता पनपी और विश्व के कोने-कोने में फैली। आज भी यह दृष्टिगोचर होता है कि ये प्रदेश विश्व के सर्वाधिक विकसित भू-भागों में से एक हैं।

मुख्य उद्योग तथा व्यवसाय (Main Industry & Occupation)

यहाँ के निवासियों के मुख्य उद्योग व व्यवसाय निम्नलिखित हैं- (i) फलों की बागवानी, (ii) पशुपालन, (iii) कृषि उद्योग, एवं (iv) वस्तु-निर्माण उद्योग आदि।

कृषि प्रणाली- भूमध्य सागर के तटीय प्रदेश बहुत प्राचीनकाल से आबाद हैं। अतः कृषि का इतिहास भी बहुत प्राचीन है। यहाँ की कृषि का विकास इस तरह हुआ है कि खाद्यान्नों के अलावा फल, तरकारियाँ तथा व्यापारिक फसलें भी पैदा की जाती हैं जिससे कृषकों को भोजन के अलावा उद्योगों के लिए कच्चा माल एवं व्यापार के लिए कृषि उत्पादन मिल जाता है। इस तरह यहाँ की कृषि, जीवन प्रवाह प्रणाली तथा व्यापारिक कृषि प्रणाली का मिश्रित रूप है। द.पू. एशिया के बाद भूमध्य सागरीय प्रदेश अत्यधिक सघन जनसंख्या के प्रदेश हैं।

अधिकांश जनसंख्या मैदान में केन्द्रित है, जहाँ 400 मनुष्य प्रति वर्ग मील से भी अधिक पाए जाते हैं। इटली की आधी जनसंख्या से भी अधिक लोग कृषि में लगे हैं। किसान अधिकतर भूमि किराये (Rent) पर लेते हैं। भूमि अधिकांशतः छोटी होती है। कृषि पद्धतियाँ इस प्रकार से विकसित हैं कि कृषक परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

शताब्दियों के प्रयोगों के बाद भूमध्य सागरीय प्रदेशों में कृषि पद्धति का विकास इस प्रकार हुआ है कि वर्षा, भूमि तथा सिंचाई का अधिक से अधिक उपयोग हो सके। मोटे तौर पर यहाँ की कृषि को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

1. वे फसलें जो जाड़े में वर्षा पर निर्भर करती हैं, जाड़े के प्रारंभ में बोई जाती हैं तथा गर्मी बढ़ने के पहले काट ली जाती हैं। इसमें अनाज मुख्य है।

2. सूखे को सहन करने वाली फसलें, जिनमें अंगूर तथा वृक्ष वाली फसलें, जैसे जैतून, नीबू, नारंगी तथा मेवे, मुख्य हैं।

3. सिंचाई के सहारे होने वाली फसलें, जिनमें सब्जी तथा फल प्रमुख हैं।

फसलों का प्रादेशिक वितरण स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार पाया जाता है। उत्तरी अफ्रीका के भागों में जहाँ औसत वार्षिक वर्षा कम है, जौ, अंगूर तथा जैतून मुख्य फसलें हैं। अंगूर से शराब बनाई जाती है व जैतून से तेल निकाला जाता है। ग्रीस में मुनक्का तथा शराब, स्पेन में नींबू तथा नारंगी, जैतून तथा शराब का उत्पादन विशेष रूप से होता है। इटली में उपर्युक्त फसलों के अलावा विस्तृत कृषि प्रदेश गेहूँ में है। कैलीफोर्निया से देश के अन्य भागों को भी कृषि उत्पादन भेजे जाते हैं। अतः सब्जियाँ तथा फल व्यापारिक पैमाने पर पैदा किये जाते हैं।

इनके अतिरिक्त महत्त्व इसलिए भी है कि जाड़े में संयुक्त राज्य के उत्तरी भागों में फसलें नहीं हो पाती हैं। मध्य चिली चूँकि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार से दूर है, अतः यहाँ का उत्पादन केवल स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होता है। दक्षिणी अफ्रीका में फलों का उत्पादन अधिक होता है जिनसे मुरब्बा बनाया जाता है। फल तथा मुरब्बे निर्यात होते हैं। आस्ट्रेलिया के सुदूर प्रदेशों में अनाज की कृषि होती है तथा पशुपालन भी महत्त्वपूर्ण है।

(Age Method)

कृषि कार्यों के लिए मानवीय शक्ति का उपयोग बृहत्त पैमाने पर होता है। कई फसलें इस प्रकार की होती हैं जिनमें मानवीय श्रम (Human Labour) की अधिक आवश्यकता होती है। जैसे―फलों को तोड़ना, सुखाना, डिब्बों में बंद करना इत्यादि कार्य जो मशीनों से नहीं हो सकते। अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वाले भागों में मशीनों का उपयोग भूमि तैयार करने, बोने तथा फसल काटने के लिए होता है।

यहाँ का बागान उद्योग अत्यन्त ही प्राचीन है। प्राचीनकाल से ही यहाँ पर अंगूर, जैतून, अंजीर, अखरोट आदि की बागवानी की जाती है। यहाँ पर फलों की बागवानी के विकास हेतु अनेक परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं।

बागवानी उद्योग विभिन्न भूमध्य सागरीय प्रदेशों में निम्न प्रकार है-

1. फ्रांस विश्व का प्रसिद्ध अंगूर उत्पादक देश है। यहाँ पर द. फ्रांस में रोनसोन घाटी में भूमध्य सागरीय फल बहुत मात्रा में पैदा किए जाते हैं। यहाँ पर विभिन्न नगरों में अंगूर से शराब तथा जैतून से तेल तैयार किया जाता है।

2. स्पेन में अंडातूशिया का मैदान अंगूर, जैतून तथा संतरे पैदा करने के लिए प्रसिद्ध है। स्पेन का यह भाग विश्व का सर्वाधिक संतरे निर्यात करने वाला क्षेत्र है। यहाँ पर भी अंगूर से शराब तथा जैतून से तेल तैयार करके निर्यात किया जाता है।

3. पुर्तगाल में बागवानी का कार्य डोरोडैगस, ग्वाडियाना तथा ग्वाडिलक्यूवर नदियों की घाटियों में किया जाता है।

4. इटली का मैदानी भाग अंगूर से शराब बनाने, जैतून से तेल निकालने, रेशम के कीड़े पालने तथा संतरे निर्यात करने के लिए विख्यात है।

5. इसी तरह साइप्रस, टर्की, इजराइल आदि राष्ट्र अंगूर तथा शराब के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण हैं। कैलीफोर्निया भी संतरों का महत्त्वपूर्ण उत्पादक है। वास्तव में इस जलवायु में बागान उद्योग महत्त्वपूर्ण और मुख्य उद्योग बन गया है। लेकिन शुष्क पर्वतीय भागों में जहाँ वर्षा कम होती है और मिट्टी कृषि तथा बागानों के लिए उपयोगी नहीं है, पशुपालन महत्त्वपूर्ण व्यवसाय बन गया है। पशुपालन यहाँ का एक अन्य कृषि कार्य है ।

पशुपालन (Live Stock)

पर्वतीय तथा पठारी प्रदेश, सूखी गर्मी एवं कम वर्षा के फलस्वरूप भूमध्य सागरीय जलवायु के प्रदेशों में प्राकृतिक वनस्पति में विस्तृत भूमि है। यहाँ झाड़ियाँ, वन तथा घास से युक्त भूमि चारागाहों की भाँति उपयोग में आती है, लेकिन चारा उत्तम प्रकार का नहीं होता है और प्रति एकड़ उत्पादन भी काफी कम है। इसी कारण यहाँ पशुओं की रखने की क्षमता अपेक्षाकृत कम है।

यहाँ के मुख्य पशु भेड़ व बकरियाँ हैं। इन पशुओं को ऊन, खाल तथा माँस प्राप्ति के लिए पाला जाता है। कुछ स्थानों पर भेड़-बकरियों के साथ ऊँट, खच्चर, गाय तथा घोड़े भी पाले जाते हैं। वैज्ञानिक विधि द्वारा इस व्यवसाय को और अधिक विकसित कर दिया गया है। अब पैक करना, बाजार में भेजना, माँस के लिए भेड़ काटना, माँस को शीत भंडार में सुरक्षित रखना आदि सभी कार्य वैज्ञानिक विधि से सम्पन्न किये जाते हैं।

शेष मैदानी भागों में कृषि मुख्य व्यवसाय है। फ्रांस की 45 प्रतिशत जनता गाँवों में निवास करती है और 23 प्रतिशत लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। यहाँ की मुख्य फसलें गेहूँ, राई, जौ, आदि हैं। इटली में नदी के बेसिन में अधिक वर्षा तथा सिंचाई की सुविधाओं के फलस्वरूप चावल भी उत्पन्न किया जाता है। चावल के अलावा मक्का-तम्बाकू के साथ-साथ शहतूत के वृक्षों पर रेशम के कीड़े भी पाले जाते हैं। वास्तव में इटली का पौवेसिन, फ्रांस की रोन-सोन घाटी, टर्की का एजियन सागर का तटवर्ती भाग विश्व का प्रसिद्ध बनाक क्षेत्र है। शीत ऋतु में, विशेषकर कृषिकार्य किया जाता है। यहाँ कृषि हेतु पर्याप्त विद्यमान हैं।

कृषि के अलावा वस्तु निर्माणकारी उद्योग भी यहाँ पर विकसित है, लेकिन यहाँ पर व भारी उद्योग अधिक विकसित नहीं हो पाए हैं। इसका मुख्य कारण यहाँ पर खपद अभाव है। यहाँ पर आधारभूत खनिज कोयला, लोहा तथा खनिज तेल बहुत कम मात्रा में जाते हैं। अतः यहाँ के उद्योग भी कृषिकृत कच्चे मालों पर आधारित है। यहाँ अंगूर से ब तैयार करना, फसलों को सुखाकर मुरब्बे तैयार करना व उन्हें डिब्बों में भरना, चमड़े की बनाना, ऊनी वस्त्र तैयार करना, रेशम वस्त्र उद्योग तथा सिगरेट बनाना महत्त्वपूर्ण व्यवसाय है। यहाँ पर लियोन्स, मिलान, स्थूनिस, वैनिज, मारसेल्स, लॉस एन्जिल्स तथा सेन आदि प्रसिद्ध औद्योगिक केन्द्र हैं।

जनसंख्या भूमध्य सागरीय भागों में जनसंख्या घनत्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से अधिक है। यह जनसंख्या उप-उष्णकटिबंध की सम्पूर्ण जनसंख्या का चार गुना तथा एशिया के मानसूनी भागों का 1/4 है। कुछ राष्ट्रों के सामने जनसंख्या समस्या बहुत ही गंभीर है, जैसे इटली यहाँ भूमध्य सागरीय प्रदेश की आधी जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या वितरण भी पर्वतीय तथा पठारी भागों की तुलना में मैदानों में अधिक है। यहाँ पर भी पौर्वासित तथा तटीय मैदानों में ही जनसंख्या की अधिक सघनता पाई जाती है।

सांस्कृतिक विकास (Cultural Development)

भूमध्य सागरीय प्रदेश मानसूनी प्रदेशों की भांति प्राचीनकाल से ही सभ्यता के केन्द्र रहे हैं। यहाँ की प्राचीन सभ्यताएं भूमध्य सागर के चतुर्दिक ओर विकसित हुई जो इस प्रकार थीं- (i) इटली की रोमन सभ्यता (1) नील घाटी में मिस्र की सभ्यता, और (iii) द. यूरोप में यूनान की सभ्यता ।

यहाँ की सभ्यताओं के विकास में यहाँ की भू-रचना तथा जलवायु का योग महत्वपूर्ण है।

“The History of civilization is the history of the soil and the education of the individual begins from the soil.

अर्थात् सभ्यता का इतिहास मिट्टियों का इतिहास है और मानव ज्ञान के अभ्युदय का अंकुर उपजाऊ मिट्टियों में ही अंकुरित होता है।

सभ्यता सामान्य जलवायु की देन है। उष्ण कटिबंधीय और ध्रुवीय विषम जलवायु के क्षेत्रों के मध्य में ही ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र हैं जहाँ प्रकृति ने सामान्य जलवायु में मानव को विकास के अवसर प्रदान किए हैं और वे क्षेत्र वास्तव में भूमध्य सागरीय प्रदेश ही रहे हैं जहाँ मानव ने प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करके तीन विभिन्न क्षेत्रों में विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं को जन्म दिया था। यहीं पर-

(i) मानव ने कृषि-विकास के लिए विभिन्न प्रयास किए। मिट्टी को उपजाऊ बनाया नहरों, कुंओं तथा तालाबों से सिंचाई सुविधाएँ प्रदान करके खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाया।

(ii) खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ने से जनसंख्या का घनत्व बढ़ा, सभ्यता बढी, मानव-ज्ञान का विकास हुआ और सांस्कृतिक पर्यावरण को जन्म मिला, क्योंकि आर्थिक रूप से सबल मालव ही सांस्कृतिक विकास के लिए विभिन्न प्रकार के साधन जुटा सकता है।

(1) प्राचीनकाल की तुलना में वर्तमान में मानव का सांस्कृतिक ढांचा बहुत बदल चुका है। प्राचीनकाल में मानव के लिए सुरक्षा प्रधान आवश्यकता थी

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