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मौर्य कला की प्रमुख विशेषताएँ, मौर्य कला का विवरण प्रस्तुत कीजिए

मौर्य वंश ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक नवीन अध्याय का सूत्रपात किया था। इस युग में न केवल प्रशासनिक व्यवस्था के क्षेत्र में, बल्कि कला, शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई थी। मौर्यकालीन शासकों ने शिक्षा, साहित्य एवं कला के विभिन्न अंगों-स्थापत्यकला, मूर्तिकला, पॉलिश, गहने बनाना, यांत्रिकी—आदि को राजकीय संरक्षण प्रदान करके उनकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर दिया था । वास्तविकता यह है कि मौर्यकाल से ही भारतीय कला के इतिहास का प्रारम्भ माना जाता है, क्योंकि मौर्यकाल से पूर्व के समय की ऐसी कोई कलाकृति उपलब्ध नहीं है जिसे कला की दृष्टि से उत्तम कलाकृति कहा जा सके।

मौर्यकालीन शासकों–विशेषतः सम्राट अशोक ने उच्च कोटि के भवन, मूर्तियों एवं स्तम्भों का निर्माण कराया था। इन सभी कलाकृतियों को भारतीय कला के सर्वश्रेष्ठ नमूनों के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। बी.जी. गोखले के शब्दों में, “सम्राट अशोक के शासनकाल से ही प्राचीन भारतीय कला का इतिहास विधिवत् प्रारम्भ होता है। उसके काल में ही सर्वप्रथम कलाकृतियों में लकड़ी के स्थान पर पत्थर का प्रयोग किया गया था। मौर्यकालीन कलाकृतियाँ तकनीकी एवं सामग्री दोनों दृष्टियों से सर्वश्रेष्ठ कही जा सकती हैं।’

मौर्यकाल में कला का विकास

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से मौर्यकालीन कला को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है— (1) स्थापत्य कला, (2) मूर्तिकला, (3) पॉलिस कारीगरी, (4) यांत्रिकी (इन्जीनियरिंग), तथा (5) अन्य लोक कलाएँ।

(1) स्थापत्य कला – मौर्यकालीन शासक उच्चकोटि के भवन निर्माता थे। उन्होंने सुन्दर भवनों, राजमहलों, स्तम्भों, गुफाओं और स्तूपों का निर्माण करने में गहरी रुचि ली थी। उनमें से कुछ कलाकृतियाँ आज भी विद्यमान हैं जो उस समय की कला क विकास की वास्तविक तस्वीर को हमारे समक्ष प्रस्तुत करती हैं। मौर्यकालीन स्थापत्यकला के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-

(अ) राजमहल एवं अन्य शाही इमारतें-मौर्य शासकों ने राजमहलों तथा अन्य सुन्दर भवनों का निर्माण कराया था। इन भवनों को प्राचीनकाल की भवन निर्माण कला के सुन्दर नमूनों के रूप में जाना जाता है। सुन्दरता एवं कलात्मकता की दृष्टि से ये भवन अतुलनीय थे। मौर्यकालीन यूनानी लेखकों ने भी यह उल्लेख किया है कि मौर्यकाल के बने हुए भवन एवं राज प्रासाद सम्पूर्ण विश्व में सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक विशाल थे। पाटलिपुत्र नगरी मौर्य शासकों की राजधानी थी। इस नगर में मौर्य वंश के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक सुन्दर राजप्रासाद एवं अन्य सुन्दर भवनों का निर्माण कराया था। इन सभी भवनों को बनाने में लकड़ी। का प्रयोग किया गया था।

मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य के राजमहल और अन्य भवनों का विस्तृत और सुन्दर वर्णन किया है। उसके शब्दों में- “भारतवर्ष में जो सबसे बड़ा नगर है वह पाटलिपुत्र कहलाता है। वह गंगा और सोन नदियों के तट पर स्थित है। यह नगर समानान्तर चतुर्भुज के आकार में बसा हुआ है। इसके चारों ओर लकड़ी की एक प्राचीर है जिसके बीच में तीर छोड़ने के लिए छेद बने हैं। दीवार के साथ चारों ओर एक खाई है जो युद्ध के समय तथा शहर की गन्दगी को बहाने के काम आती है। यह खाई 45 फुट गहरी और 600 फुट चौड़ी है। नगर के चारों ओर की प्राचीर 570 बुर्जों से सुशोभित है और उसमें 64 द्वार बने हुए हैं।

पाटलिपुत्र के राजप्रासाद में अनेकों कृत्रिम झीलें, चिड़ियाँ, पशु-पक्षी तथा विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष थे। चूँकि चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में सभी भवनों के निर्माण कार्य में अधिकांशतः लकड़ी का प्रयोग किया गया था, इसलिए ऐसा अनुमान है कि पानी और अग्नि के कारण वे सभी भवन नष्ट हो गए। सम्राट अशोक के शासनकाल में भवनों के निर्माण में पालिश किया हुआ पत्थर प्रयोग किया जाने लगा। अतः स्थापत्य कला के क्षेत्र में सम्राट अशोक के शासनकाल में एक नवीन युग प्रारम्भ हुआ। उसने राजधानी पाटलिपुत्र में एक सुन्दर राजमहल का निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में स्तूपों, गुफाओं, अभिलेखों, स्तम्भों आदि का निर्माण भी अशोक के शासनकाल में ही किया गया था। ये भवन आज भी स्थापत्य कला के असाधारण नमूने हैं।

मौर्य कला की प्रमुख विशेषताएँ

गुप्त वंश के सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान ने भारत की यात्रा की थी। उसने जब पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गये राजमहल को देखा तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने भवन की प्रशंसा करते हुए यहाँ तक लिख दिया कि इस प्रकार की सुन्दर, आकर्षक और आश्चर्यजनक इमारत का निर्माण मानवीय हाथों द्वारा असम्भव है। स्वयं उसी के शब्दों में- “यह राजमहल मानव कृति नहीं है, बल्कि देवों के द्वारा निर्मित है। राजप्रासाद के स्तम्भ पत्थरों से बने हुए हैं और उन पर अद्वितीय उभरे चित्र बने हुए हैं ।

(ब) अशोक के स्तूप-कलिंग युद्ध के पश्चात् सम्राट अशोक के धार्मिक विचारों में व्यापक परिवर्तन हो गया। उसने बौद्ध धर्म को अपना लिया तथा मानव जाति के लिए एक ऐसे धर्म का प्रतिपादन किया जिसके अन्तर्गत हिंसा, घृणा, शत्रुता, युद्ध आदि के लिए कोई स्थान नहीं था। स्वयं प्रेम, बन्धुत्व एवं अहिंसा का उपासक बन गया और उसने धर्म एवं धार्मिक विचारों का देश-विदेशों में प्रचार करने के लिए अनेकों महत्वपूर्ण व प्रभावशाली कदम उठाये।

धार्मिक भावना से प्रेरित और प्रभावित होकर अशोक ने देश के विभिन्न भागों में तथा अन्य देशों में अनेकों स्तूपों का निर्माण कराया। यह कहा जाता है कि अशोक के शासनकाल में लगभग 84 हजार स्तूपों का निर्माण कराया गया था। स्तूप उल्टे कटोरे के आकार का एक ठोस गुम्बद होता था जिसे पत्थर अथवा ईंटों से बनाया जाता था। इन स्तूपों का आन्तरिक भाग कच्ची ईंटों तथा बाहरी भाग पक्की ईंटों का बना होता था।

स्तूप की परिक्रमा करने के लिए चारों ओर प्रदक्षिणा पथ होता था। इन स्तूपों में महात्मा बुद्ध और अन्य बौद्ध विद्वानों के शवों के अवशेषों को रखा जाता था। इसके अतिरिक्त बौद्ध धर्म से सम्बन्धित तीर्थ स्थानों को ख्याति प्रदान करने के उद्देश्य से भी अशोक ने स्तूपों का निर्माण कराया था। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि स्तूपों का धार्मिक आधार और धार्मिक महत्व था। स्तूपों की छत पर उल्टे छाते के आकार की छत भी उसकी धार्मिक और आध्यात्मिक सार्वभौमिकता की ओर संकेत करती है ।

चीनी यात्री फाह्यान ने सम्पूर्ण भारत में विभिन्न स्थानों पर अशोक द्वारा निर्मित अनेकों स्तूपों को देखा था, जिनका वर्णन उसने अपने यात्रा-विवरण में किया है। उसने इन स्तूपों की भवन-निर्माण कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। इसी प्रकार सातवीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आये यात्री ह्वेनसांग ने भी भारत और अफगानिस्तान में अनेकों स्तूपों को देखा था।

मौर्यकाल के स्तूपों में से वर्तमान समय में जो स्तूप शेष बचे हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ साँची का स्तूप है। यह स्तूप मध्य प्रदेश में भोपाल के निकट साँची नामक स्थान पर बना हुआ है। इस स्तूप के आधार के समीप इसका व्यास लगभग सौ फुट है। यह स्तूप लाल रंग के बलुआ पत्थर का बना हुआ है। यह अर्द्धमण्डलाकार रूप से बना हुआ है और इसके चारों ओर एक प्रदक्षिणा पथ है।

इस स्तम्भ के शीर्ष भाग पर सिंह की मूर्तियाँ हैं जो वर्तमान समय में टूटी स्थिति में है । किन्तु इस स्थिति में भी वे अशोककालीन कला की सर्वोत्कृष्टता को प्रमाणित करती हैं। इतिहासकार जॉन मार्शल का विचार है कि साँची का स्तूप मूल रूप में आधुनिक समय में उपलब्ध भाग के आधे से अधिक नहीं था जिसे बाद में सम्भवतः निर्मित करके वृहद् रूप दे दिया गया । किन्तु इस तर्क के पक्ष में ठोस प्रमाण नहीं मिलता।

अन्य स्तूपों में भरहुत का स्तूप भी स्थापत्य कला की दृष्टि से अत्यन्त सुन्दर है। इस स्तूप का सर्वप्रथम पता सन् 1873 में सर कनिंघम ने लगाया था। उनके मतानुसार स्तूप का मूल व्यास 68 फुट था। वर्तमान समय में यह स्तूप प्रायः नष्ट हो चुका है और इसकी पाषाण वेष्टनी के बहुत से खण्ड कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से हमें ज्ञात होता है कि अशोक ने तक्षशिला, श्रीनगर, कपिलवस्तु, बनारस, अयोध्या, प्रयाग और कन्नौज में भी स्तूपों का निर्माण कराया था। उसके मतानुसार तक्षशिला में तीन स्तूप बने हुए थे जिनकी ऊँचाई सौ फुट थी। इन स्तूपों की दीवारों के पत्थर बड़ी कुशलता के साथ तरासे गये थे। इन तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मौर्यकाल में स्थापत्य कला का स्तर बहुत ऊँचा था ।

(स) अशोक के स्तम्भ-सम्राट अशोक द्वारा निर्मित कलाकृतियों में सबसे अधिक महत्व उसके स्तम्भों का है। अशोक ने अपने धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से अपने अभिलेखों को उत्कीर्ण करने के लिए इन स्तम्भों का निर्माण कराया था। ये स्तम्भ मौर्यकालीन कला के सर्वश्रेष्ठ एवं सुन्दर उदाहरण हैं। इन स्तम्भों से यह सिद्ध हो जाता है कि उस समय भारत की स्थापत्य कला, यांत्रिकी और मूर्ति कला अन्य किसी देश से किसी भी स्थिति में कम विकसित नहीं थी। इन स्तम्भों की ऊँचाई 50 फुट से 60 फुट तक तथा भार लगभग 50 टन था। यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि इन स्तम्भों का निर्माण एक ही पत्थर शिला को काटकर किया गया है।

इन स्तम्भों का निर्माण चुनार के बलुआ पत्थर से किया गया है। ये स्तम्भ आधार की ओर मोटे तथा ऊपर की ओर पतले होते गये हैं। इनके तीन भाग हैं- (i) ध्वज अथवा स्तम्भ का तना, जो सादा होते हुए भी बहुत चिकना और चमकीला है। (ii) अण्ड अथवा गला, गोलाकार बना हुआ है तथा चक्र, पशु, पक्षी, लता, फूल आदि से सजा हुआ है। (iii) सबसे ऊपर जो का भाग शीर्ष कहलाता है जिसमें शेर, हाथी, बैल, घोड़ा आदि मूर्तियाँ एक साथ बनी हुई हैं।

सम्राट अशोक के स्तम्भों की प्रशंसा करते हुए डॉ. बी. ए. स्मिथ ने लिखा है—“स्तम्भों की निर्माण कला और तकनीकी से स्पष्टतः सिद्ध हो जाता है कि अशोककालीन इंजीनियर और पत्थर काटने वाले कारीगर उस समय किसी भी देश से कम योग्य और श्रेष्ठ नहीं थे ।

अशोक के समय के बने हुए स्तम्भों में सुन्दरता और कलात्मकता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ सारनाथ स्तम्भ माना जाता है। इसके ऊपर अशोक के धर्म की लिपि खुदी हुई है। इसके शीर्ष भाग पर चार सिंह मूर्तियाँ हैं जो एक-दूसरे की पीठ से पीठ लगाकर बैठे हुए दिखाये गये हैं। यह कलाकृति मौर्यकाल की प्रगति का जीता-जागता प्रमाण है। इस स्तम्भ पर एक प्रकार का लेप किया गया है जिससे हजारों वर्ष बाद भी यह स्तम्भ उतना ही चिकना, चमकदार और सुन्दर है।

हमारी आधुनिक सरकार ने भी अपनी मुद्रा पद्धति में चार सिंहों की कलाकृति का प्रयोग किया। सारनाथ स्तम्भ के शीर्ष भाग की कलात्मकता के कारण ही इस स्तम्भ को भारतीय कला का अद्वितीय नमूना माना जाता है। डॉ. स्मिथ के शब्दों में- “सारनाथ स्तम्भ के स्थापत्य की तुलना में प्राचीनकाल की पशु स्थापत्य कला का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता ।

इसी प्रकार सर जॉन मार्शल ने भी सारनाथ स्तम्भ की स्थापत्य कला और मूर्तिकला की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने कला तकनीक और शैली के दृष्टिकोण से चार सिंहों को सर्वश्रेष्ठ कलाकृति की संज्ञा प्रदान की है। डॉ. वी. ए. स्मिथ का यह दृढ़ मत है कि सम्पूर्ण विश्व में सारनाथ स्तम्भ की तुलना में कला का कोई श्रेष्ठ नमूना उपलब्ध नहीं है ।

(द) गुफायें-गुफायें भी मौर्यकला की उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती हैं। चूँकि अशोक एक धर्मपरायण शासक था, इसलिए उसने अनेकों गुफाओं का निर्माण कराया था। इनका निर्माण बौद्ध भिक्षुओं के रहने के उद्देश्य से कराया गया था। ये गुफायें पूजागृहों और सभा कक्षों का कार्य भी करती थीं। अत्यन्त कठोर चट्टानों को काटकर इन गुफाओं को बनाया जाता था। इन गुफाओं की अन्दर की दीवारों पर इतनी सुन्दर और कुशलता के साथ पॉलिश की जाती थी कि वे दर्पण की भाँति चमकती थीं।

गया के समीप नागार्जुन और बाराबर की पहाड़ियों में अनेकों मौर्यकालीन गुफायें पाई जाती हैं। सम्राट अशोक के पौत्र दशरथ ने भी चट्टानों को काटकर गुफाओं और मन्दिरों का निर्माण कराने में गहरी रुचि ली थी। उसके द्वारा निर्मित कलाकृतियों में सर्वश्रेष्ठ ‘गोपी गुहा’ है जो बाराबर की पहाड़ियों में स्थित है। अशोक द्वारा निर्मित कराई गई गुफाओं में ‘सुदामा गुफा’ सबसे प्राचीन है जिसे उसने आजीविका मत के भिक्षुओं को समर्पित कर दी थी। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सम्राट अशोक धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु शासक था ।

(2) मूर्ति कला-विभिन्न स्थानों पर किए गये खुदाई कार्यों से अनेकों मौर्यकालीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि मौर्य काल में न केवल स्थापत्य कला का ही विकास हुआ था, बल्कि मूर्तिकला भी उस समय विकसित अवस्था में थी। उस युग में कलाकार विभिन्न पशुओं की अत्यन्त सजीव और आकर्षक मूर्तियाँ बनाते थे। सारनाथ के स्तम्भ के चार सिंहों की कलात्मकता का वर्णन पिछली पंक्तियों में किया जा चुका है। इसी प्रकार धौली में उपलब्ध हाथी की आकर्षक मूर्ति दर्शकों का मन मोह लेती है। उस मूर्ति को कलाकार ने एक विशाल चट्टान को काटकर तैयार किया है। इसी प्रकार पटना के निकट दीदार गंज नामक स्थान पर यक्ष की एक मूर्ति प्राप्त हुई है जिसकी लम्बाई 6 फुट नौ इंच है। इस मूर्ति को बनाने में कलाकार ने जिस प्रकार की कलाकारी का प्रयोग किया है, वह प्रशंसनीय है। इसके अतिरिक्त मथुरा के निकट परखम, पटना, बेस नगर (मध्य प्रदेश) आदि स्थानों पर भी मौर्यकालीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। पाटलिपुत्र के समीप जैन-तीर्थंकरों की भी अनेकों मूर्तियाँ मिली हैं जो खण्डित अवस्था में हैं किन्तु कलात्मकता की दृष्टि से ये सभी मूर्तियाँ अद्वितीय हैं। मौर्यकालीन मूर्तिकला की प्रशंसा करते हुये सर जॉन मार्शल ने लिखा है-“ये मूर्तियाँ भारत में बनने वाली सभी मूर्तियों की तुलना में शैली और तकनीक दोनों दृष्टियों से सर्वोत्तम हैं। मुझे प्राचीनकाल की इस प्रकार की अन्य मूर्तियाँ दृष्टिगोचर नहीं होती।’

(3) पॉलिश कारीगरी-मौर्य शासकों के शासनकाल में कठोर पत्थरों से बनाए गये स्तम्भों, गुफाओं और अन्य कलाकृतियों पर बड़ी कुशलता के साथ पॉलिश की जाती थी । वास्तविकता यह है कि उस युग में कठोर पत्थरों पर पॉलिश करने की कला का आधुनिक युग की अपेक्षा अधिक विकास हो चुका था। नागार्जुन तथा बाराबर पहाड़ियों में बनी हुई गुफाओं की दीवारों पर इतनी सुन्दरता से और कुशलतापूर्वक पॉलिश की गई है कि दीवारें शीशे की भाँति चमकती हैं।

दिल्ली में फीरोजशाह कोटला पर स्थित अशोक स्तम्भ पर की गई पॉलिश इतनी आकर्षक एवं कलात्मक है कि विशप हैवर जैसे अनेकों पर्यवेक्षकों और दर्शकों को यह भ्रम हो गया कि उक्त स्तम्भ पत्थर से निर्मित है अथवा पीतल धातु से। डॉ. वी. ए. स्मिथ ने मौर्यकालीन पॉलिश कारीगरी की प्रशंसा और उसकी उत्कृष्टता का वर्णन करते हुए लिखा – The art of polishing hard stone was carried to such perfection that it is said to have become a lost art beyond modern powers. The sides of the Barabar caves are polished like glass mirrors.”

(4) यांत्रिकी-सम्राट अशोक के शासनकाल में यांत्रिकी (इंजीनियरिंग) के क्षेत्र में भी उन्नति हुई थी। अशोक द्वारा बनवाये गये स्तम्भ और गुफाओं से मौर्य युग की इंजीनियरिंग कला के विकास की पुष्टि होती है। उस समय के स्तम्भ बहुत भारी हैं। यह अनुमान है कि प्रत्येक स्तम्भ की लम्बाई लगभग 50 फुट तथा भार लगभग 50 टन है। इन स्तम्भों को बनाने से पूर्व सर्वप्रथम विशाल चट्टानों को बड़े-बड़े टुकड़ों में काटा जाता था तथा उन टुकड़ों में से स्तम्भ बनाए जाते थे।

इन भारी स्तम्भों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफलतापूर्वक ले जाने का कार्य कुशल इंजीनियरों के सहयोग के बिना सम्भव ही नहीं था। इसी प्रकार गुफाओं का निर्माण भी कठोर पत्थरों की बड़ी-बड़ी चट्टानों को काटकर किया गया था। यह कार्य भी सम्भवतः कुशल इंजीनियरों के निर्देशन में ही किया गया होगा ।

(5) अन्य लोक कलाएँ-आभूषण बनाने की कला-सम्राट अशोक के शासनकाल में गहने एवं आभूषण बनाने की कला का भी प्त विकास हुआ था। तक्षशिला के उत्खनन से जो आभूषण प्राप्त हुए हैं, उनसे यह सिद्ध होता है कि उस समय गहने बनाने का कार्य कुशल एवं योग्य कारीगरों द्वारा किया जाता था ।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारतीय कला के विकास में मौर्यकालीन शासकों का प्रशंसनीय योगदान था। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि कला के विकास की दृष्टि से मौर्यकाल भारतीय इतिहास का उज्ज्वल काल था जो एक स्वर्ण युग से कम नहीं था ।

मौर्यकाल में बनाये गये स्तूपों, स्तम्भों और अभिलेखों के माध्यम से देश में सांस्कृतिक एकता की भावना का सूत्रपात हुआ था। मौर्य सम्राटों ने कला एवं धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान करके उनके समुचित विकास के लिये अनुकूल वातावरण तैयार किया था। फलस्वरूप स्थापत्य कला और मूर्तिकला का सर्वोत्कृष्ट विकास हुआ और कला के क्षेत्र में भारत विश्व में एक प्रमुख देश बन गया। वस्तुतः मौर्यकाल में भारतीय कला ने अपनी श्रेष्ठता, दक्षता, कुशलता और कलात्मकता के उत्कर्ष बिन्दु की ओर बढ़ना प्रारम्भ कर दिया था।