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Sakat Chauth: सकट चौथ व्रत कथा, आरती का समय, पूजा की सामग्री और विधि

सकट चौथ व्रत: आज का दिन महिलाओं के लिए बहुत ही खास होने वाला है क्योंकि इस दिन महिलाएं संतान की प्राप्ति और उनकी लंबी आयु के लिए सकट चौथ का व्रत रखती है। हिंदी पंचांग के अनुसार यह व्रत माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इस व्रत में भगवान गणेश और चंद्रमा की पूजा की जाती है ताकि सभी संकटों और कठिनाइयों से मुक्ति प्राप्त कर सके। आज इस आर्टिकल में जानिए सकट चौथ के व्रत की सही पूजा विधि, आवश्यक सामग्री, मुहूर्त और महत्व के बारे में विस्तृत रूप से बताया गया है।

सकट चौथ व्रत का महत्व

सकट चौथ व्रत एक महत्वपूर्ण व्रत है जो महिलाओं द्वारा अपने परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए रखा जाता है। यह हिंदू धर्म में एक प्रचलित व्रत माना जाता है। यह व्रत माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को “सकट चौथ”, “तिलकुट चौथ”, “माघी चौथ” और “संक्रांति चौथ” के नाम से भी जाना जाता है।

इस व्रत को महिलाएं अपने संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए रखती हैं। मान्यता है कि इस दिन गणेश जी की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।

सकट चौथ व्रत कथा का मुहूर्त

सकट चौथ का व्रत सोमवार, 29 जनवरी 2024 को सुबह 6:10 से शुरू हुआ था और यह व्रत मंगलवार, 30 जनवरी को सुबह 8:55 पर और पूर्ण होगा।

सकट चौथ व्रत के नियम

सकट चौथ व्रत (के कुछ नियम हैं जिन्हें महिलाओं को पालन करना चाहिए। इन नियमों में शामिल हैं:

  • व्रत रखने वाली महिला को पूरे दिन उपवास करना चाहिए।
  • व्रत रखने वाली महिला को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए।
  • व्रत रखने वाली महिला को गणेश जी और चंद्र देव की पूजा करनी चाहिए।
  • व्रत रखने वाली महिला को चंद्र देव को अर्घ्य देना चाहिए।
  • व्रत रखने वाली महिला को व्रत का पारण करना चाहिए।

सकट चौथ व्रत का पारण

सकट चौथ व्रत का पारण चंद्र देव के दर्शन के बाद किया जाता है। व्रत का पारण करने के लिए महिलाएं चंद्र देव को अर्घ्य देती हैं और फिर प्रसाद ग्रहण करती हैं।

सकट चौथ पूजा सामग्री

सकट चौथ पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

  • गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर
  • चंद्र देव की मूर्ति या तस्वीर
  • चंदन
  • रोली
  • अक्षत
  • हल्दी की गांठ
  • सुपारी
  • पान का पत्ता
  • धूपबत्ती
  • घी का दीपक
  • चावल
  • फल
  • मिठाई
  • तिलकुट
  • रक्षासूत्र
  • व्रत कथा की पुस्तक

पूजा विधि

सकट चौथ पूजा निम्नलिखित चरणों में की जाती है:

  1. सबसे पहले, एक चौकी पर गणेश जी और चंद्र देव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  2. फिर, गणेश जी और चंद्र देव को चंदन, रोली, अक्षत, हल्दी की गांठ, सुपारी, पान का पत्ता, धूपबत्ती और घी के दीपक से पूजन करें।
  3. इसके बाद, गणेश जी और चंद्र देव को चावल, फल और मिठाई का भोग लगाएं।
  4. फिर, व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  5. अंत में, चंद्र देव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।

पूजा के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

  • पूजा करते समय मन को एकाग्र रखें और भगवान से प्रार्थना करें कि वह आपके परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली प्रदान करें।
  • पूजा के दौरान किसी भी प्रकार की अशुद्धता से बचें।
  • पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें।

सकट चौथ व्रत की आरती

सकट चौथ व्रत की पूजा के दौरान गणेश जी को दीप, धूप, फूल, चावल, फल, मिठाई आदि अर्पित की जाती हैं। आरती के साथ-साथ गणेश जी से प्रार्थना की जाती है कि वह सभी के कार्यों में सफलता प्रदान करें। 

जय गणेश जय गणेश आरती

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।

एकदंत दयावंत, चार भुजाधारी।

मूसे की सवारी, जय गणेश हरी।

अंग भरे सुगंधित, तन मन अति सोहे।

आभूषण ढके शरीर, जय गणेश हरी।

चंदन का तिलक, फूलों की माला।

भोग लगाया नारियल, जय गणेश हरी।

सूर्य चंद्रमा तारे, गणेशजी की जय।

ऋषि मुनिजन गाते, जय गणेश हरी।

शुभ कार्य में प्रथम पूज्य, तुम हो गणपति।

विघ्न हरण मंगलकारी, जय गणेश हरी।

संतोषी माता, शीतला माता।

सभी देवता जयते, जय गणेश हरी।

सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।

सकट चौथ व्रत की कहानी

एक समय की बात है किसी गांव में एक देवरानी और एक जेठानी रहा करती थी। जेठानी अमीर थी तो देवरानी बहुत गरीब थी, उसका पति जंगल से लड़कियां काट कर लाता और शहर में ले जाकर बेचा करता था और वह बहुत बीमार रहा करता था। देवरानी जेठानी के घर में काम किया करती और बदले में जेठानी उसे बचा हुआ खाना, पुराने कपड़े आदि दे दिया करती थी। एक समय जब माघ मास की तिल चौथ आई तो देवरानी ने 5 रुपए का तिल और गुड़ खरीदा और तिल चौथ का व्रत रखा। 

पूजा पाठ करके व्रत की कथा सुनकर उसने तिलकुटा बनाया और उसे अपनी रसोई के छींके में रखकर जेठानी के घर काम करने चली गई। जेठानी के घर का सारा काम खत्म करके, उसने जेठानी के बच्चों से कहा खाना खा लो तो बच्चों ने कहा मां के साथ खाएंगे। फिर उसने अपनी जेठ से खाना खाने को कहा तो जेठ ने भी मना कर दिया। अब देवरानी अपनी जेठानी के पास गई और कहने लगी दीदी अभी तो सब खाना खाने से मना कर रहे हैं अगर आप कहो तो मैं अपने घर चली जाऊं। जेठानी बोली ठीक है तुम घर चली जाओ, अभी तो किसी ने भी मेरे घर में खाना नहीं खाया। इसलिए मैं अभी तुम्हें कुछ भी नहीं दे सकती, कल सुबह जल्दी आकर बचा हुआ खाना ले जाना।

यह बात सुनकर देवरानी को बहुत दुख हुआ और वह अपने घर की ओर चल पड़ी। उधर घर में उसका पति और बच्चे इंतजार कर रहे थे कि आज तो व्रत का दिन है मां आएगी तो पकवान लाएगी। घर आकर उसने सारी बात अपने पति और बच्चों को कही। यह सुनकर बच्चे रोने लगे और उसका पति नाराज हो गया। पूरे दिन काम करने के बाद भी अगर तू दो रोटी नहीं ला सकती तो तेरे काम का क्या फायदा, ऐसा कहकर गुस्से में आकर उसने उसे कपड़े धोने के डंडे से खूब मारा। कपड़े धोने का डंडा टूट गया तो उसने उसे पट्टे से मारा। 

भूखी-प्यासी वह बेचारी रात को पानी पीकर भूखे पेट ही सो गई। रात को उसके सपने में चौथ के विनायक महाराज आए और कहने लगे धोब ना मारी, पाटा मारी, जाग रही है या सो रही है तो वह बोली कुछ जाग रही हूं कुछ सो रही हूं। गणेश जी फिर बोले मुझे भूख लगी है कुछ खाने को दे दो। वह बोली मेरे घर में तो खाने का एक दाना भी नहीं है। मैं आपको खाने को क्या दूं लेकिन हां रसोई घर के छींके में थोड़ा सा पूजा का तिलकुटा रखा है वही खा लो। वह तिलकुटा खाकर गणेश जी महाराज उससे फिर बोले धोब ना मारी पाटा मारी निपटाए लगी है कहां निपटु। वह बोली यह झोपड़ी देख रहे हैं महाराज, यह मेरी ही है जहां मन करे वहां नीमट लो। गणेश जी महाराज उसकी झोपड़ी में जगह-जगह निमटते हैं उसके बाद फिर उससे पूछते हैं धोब ना मारी पाटा मारी, अब मैं कहां पोंछू। वह गुस्से में आकर उनसे कहती है यह रहा मेरा सर यहां पूछ लो।

इसके बाद गणेश जी महाराज अंतर ध्यान हो जाते हैं, अगले दिन सुबह उसकी आंख खुलती है तो देखी है कि उसके घर में चारों ओर सोने चांदी के भंडार भरे थे। उसके सर में हीरे-मोती जगमगा रहे थे। अन्न-धन के भंडार भरे थे। उधर सारा दिन निकलने पर जेठानी अपने बच्चों को जेठानी अपने बच्चों को चाची को बुलाने भेजती है और कहती है कल खाना नहीं दिया तो बुरा मान गई, आज काम पर नहीं आई। जाओ जाकर उसे बुलाकर ले आओ।

बच्चे दौड़े दौड़े चाची के घर आते हैं तो देखते हैं कि चाची के घर में तो सोने-चांदी के भंडार भरे हैं। वह उससे कहते हैं, चाची-चाची चलो मां ने बुलाया है। वह आगे से कहती है बहुत कर लिया तुम्हारी मां के यहां काम, अब अपनी मां को मेरे यहां काम पर भेज दो। बच्चे वापस अपनी मां के पास जाकर उसे सारी बात बताते हैं। जेठानी दौड़ी-दौड़ी सब बात पता करने के लिए देवरानी के घर आती है और इतना सोना चांदी देखकर वह भी चौंक जाती है और देवरानी से इन सब का कारण पूछती है तो देवरानी उसे चौथ विनायक महाराज की कृपा की सारी बात बता देती है।

अगले साल जब माघ मास की सकट चौथ आती है तो जेठानी अपने पति से कहती है आप मुझे खूब मारो। उसका पति कहता है अरे भाग्यवान कैसी बात कर रही है, मैं भला तुझे क्यों मरने लगा लेकिन वह हठ कर लेती है और अपने पति से कहती है मुझे इस डंडे से मारो। गुस्से में जाकर उसका पति उसे कपड़े धोने के डंडे से खूब मारता है। अब वह खुशी-खुशी खूब घी और मेवा डालकर तिलकुटा बनती है और उसे रसोई में रखकर चादर तानकर सो जाती है। थोड़ी ही देरबाद जेठानी के सपने में चौथ विनायक जी महाराज आते हैं और कुछ खाने को मांगते हैं तो वह कहती है अरे विनायक जी महाराज मेरी देवरानी के तो अपने रुखा-सुखा थोड़ा सा तिलकुटा खाया था। मैंने तो खूब घी और मेवे डालकर तिलकुटा बनाकर छींके में रखा है वही खा लो। इसके बाद गणेश जी महाराज उससे पूछते हैं कहां निपटु। तो वह कहती है मेरी देवरानी की तो टूटी-फूटी झोपड़ी थी मेरा तो इतना सुंदर महल है जहां-जहां आपका मन करे वहां वहां नीमट लो। इसके बाद गणेश जी उसे कहते हैं कहां पूछूं तो वह कहती है गणेश जी महाराज मेरे देवरानी का तो रुखा-सुखा गंदा सा सर था मेने तो चमेली का तेल लगाया है मेरे सर में पूछ लो।

इसके बाद गणेश जी अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वह सुबह जल्दी-जल्दी अपना सोना चांदी बटोरने के लिए उठाती है तो दिखती है उसके घर में चारों ओर गंदगी फैली होती है जिससे बहुत गंदी बदबू आ रही होती है। यह देखकर वह अपना सर पड़कर रोने लगती है। उसका पति गुस्से में उससे कहता है यह ले मिल गया सकट चौथ का फल और वह बेचारी उस गंदगी को समेटना शुरू करती है। वह उस गंदगी को जितना समेटती वह उतनी ही फैलती जाती। यह सब देखकर वह गणेश जी के आगे हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती है और कहती है महाराज यह कैसी माया है आपकी, देवरानी पर टूटे और मुझसे रूठे। जेठानी की यह बात सुनकर गणेश जी महाराज उससे कहते हैं तेरी देवरानी ने सच्चे मन से सकट चौथ का व्रत किया था। इसलिए मैं उससे प्रसन्न हुआ लेकिन तूने ईर्ष्या और लालच में आकर इस व्रत का पालन किया है। तब जेठानी कहती है महाराज मैं मेरा सबक सीख गई है। हे गणेश जी महाराज! जैसी कृपा देवरानी पर की वैसे ही इस कथा को कहते-सुनते और हुंकारा भरते सब पर करना। अधूरी हो तो पूरी करना पूरी हो तो मान करना, जय चौथ विनायक महाराज।