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भक्ति आन्दोलन से आप क्या समझते हैं? भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषताओं तथा प्रभावों का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए

भक्ति आन्दोलन- साधारण शब्दों में भक्ति आन्दोलन का अर्थ भगवान की आराधना से है। देवर्षि नारद के अनुसार, “अपने सभी कार्यों को भगवान के अर्पण करना ही भक्ति है। भक्ति के बदले में किसी भी प्रकार की कामना का त्याग करना अथवा बदले में कुछ भी न चाहना सच्ची भक्ति कहलाती है।”

What do you understand by Bhakti movement?

भारतीय संस्कृति के इतिहास में भक्ति आन्दोलन का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। भक्ति के माध्यम से हर कोई भगवान की प्राप्ति कर सकता है। इसमें जात-पात, ऊंच-नीच के भेदभाव बाधक नहीं बन सकते थे। यह एक लोकप्रिय जन आन्दोलन था जिसने सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी है और भारतीय संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया है। इसने जहाँ एक ओर बाह्याडम्बरों, अन्धविश्वासों तथा अज्ञानता का विरोध कर शुद्ध भगवत् भक्ति पर बल दिया, वहाँ दूसरी ओर हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों में समन्वय स्थापित करने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।

भक्ति आन्दोलन की पृष्ठभूमि

प्राचीन भारत की आध्यात्मिक परम्परा में जीवन का अन्तिम लक्ष्य मुक्ति या मोक्ष प्राप्त करने के लिए तीन मार्ग बताये गये हैं-कर्म, ज्ञान और भक्ति। समय-समय पर इन मार्गों पर जोर दिया गया है। वेदों में कर्म-मार्ग की प्रमुखता है तो उपनिषदों में ज्ञानमार्ग की। गीता में इन तीनों में समन्वय स्थापित करने का सफल प्रयास किया गया है। इन सबमें भक्ति-मार्ग का प्रचार इस्लाम के प्रभाव से हुआ परन्तु इतना स्वीकार किया जा सकता है कि इस्लाम के एकेश्वरवाद आदि सिद्धान्तों से इस आन्दोलन को प्रेरणा मिली। वास्तव में भक्ति आन्दोलन का इतिहास महान् धर्म-सुधारक शंकराचार्य के समय से आरम्भ होता है जिन्होंने अद्वैतवाद का प्रतिपादन करते हुए ज्ञान-मार्ग को ही सर्वोपरि घोषित किया परन्तु शंकराचार्य का अद्वैतवाद तथा ज्ञान-मार्ग जनसाधारण को आकर्षित नहीं कर सका।

अतः मध्ययुगीन धार्मिक विचारों ने भक्ति-मार्ग का प्रतिपादन किया। उस समय तक मुस्लिम शासन की जड़ें भारत में दृढ़तापूर्वक स्थापित हो चुकी थीं। एक ओर हिन्दू मुसलमान शासकों के अत्याचारों के शिकार बन रहे थे, तो दूसरी ओर हिन्दू धर्म अनेक कुरीतियों, पाखण्डों और आडम्बरों से ग्रसित होकर पतनोन्मुख हो रहा था। अतः इस युग की मांग थी कि हिन्दू धर्म को कर्मकाण्डों और आडम्बरों से मुक्त कर जन-मानस में लोकप्रिय बनाया जाय। भक्ति आन्दोलन उस समय की पुकार थी जिसने इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की। इसे भक्ति आन्दोलन इसलिए कहा जाता है कि इसमें भक्ति को मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन बनाया गया है।

भक्ति-आन्दोलन के उदय के प्रमुख कारणभक्ति आन्दोलन के उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1) वैदिक धर्म की जटिलता- वैदिक धर्म केवल सिद्धान्तों पर बल देता था। इसमें कर्मकाण्डों तथा आडम्बरों की बहुलता थी। इसकी अव्यावहारिक और जटिल शिक्षाओं के कारण जन-साधारण में वैदिक धर्म के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई। इन परिस्थितियों में लोग भक्तिमार्ग की ओर आकर्षित हुए। वे वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों से छुटकारा पाकर भक्ति-मार्ग द्वारा परमात्मा की उपासना करने लगे ।

(2) मुस्लिम शासकों के अत्याचार- जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण करके हजारों हिन्दुओं का वध किया और उनके मन्दिरों, मूर्तियों तथा तीर्थ-स्थानों को नष्ट कर दिया तो हिन्दुओं में घोर निराशा फैल गई । अतः मध्ययुग के सन्तों ने निराश हिन्दुओं के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम व आस्था पुनः उत्पन्न करने के लिए भक्ति-मार्ग जैसा सरल सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसके परिणामस्वरूप भक्ति-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ ।

(3) आश्रय की खोज-चौदहवीं शताब्दी तक भारत में मुस्लिम शासन दृढ़तापूर्वक स्थापित हो चुका था। मुस्लिम शासकों ने अनेक शक्तिशाली राजपूत-नरेशों को पराजित करके उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था। इस स्थिति में हिन्दुओं में घोर निराशा छाई हुई थी तथा उन्हें पराधीनता के बन्धन से मुक्ति पाने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता था। इस स्थिति में हिन्दुओं को भगवान की शरण में जाने की प्रेरणा मिली और वे भक्ति-मार्ग की ओर अग्रसर होते चले गए।

(4) धार्मिक पाखण्ड और आडम्बर-हिन्दू-समाज अनेक प्रकार की कुरीतियों, पाखण्डों, आडम्बरों तथा अन्धविश्वासों का शिकार बना हुआ था। जाति-प्रथा तथा ऊंच-नीच के भेदभावों के कारण समाज में शूद्रों की स्थिति अत्यन्त शोचनीय बनी हुई थी। इस कारण शूद्रों में तीव्र असन्तोष फैला हुआ था। समाज में अनैतिकता, विलासिता, भौतिकता आदि का दूषित प्रभाव फैला हुआ था। परिणामस्वरूप मध्ययुग के धार्मिक तथा सामाजिक सुधारकों ने धार्मिक कुरीतियों को दूर करने के लिए भक्ति-आन्दोलन का सूत्रपात किया ।

(5) सरल मार्ग की आकांक्षा-यद्यपि शंकराचार्य ने अद्वैतवाद तथा ज्ञान-मार्ग का प्रचार किया था परन्तु साधारण जनता ज्ञान-मार्ग की ओर आकर्षित नहीं हो सकी। अतः मध्ययुग के धार्मिक विचारकों ने साधारण जनता के मस्तिष्क को हिन्दू-धर्म की ओर आकृष्ट करने के लिए भक्ति-मार्ग को अधिक महत्व दिया। भक्ति-मार्ग शंकराचार्य के ज्ञान-मार्ग की अपेक्षा अधिक सरल तथा व्यावहारिक था । इसलिए जन-साधारण सरलता से भक्ति-मार्ग की ओर प्रवृत्त हुआ ।

(6) इस्लाम धर्म का प्रभाव-कुछ विद्वानों का मत है कि भक्ति-आन्दोलन का प्रादुर्भाव इस्लाम धर्म के प्रभाव से ही हुआ। डॉ. आर.सी. मजूमदार के अनुसार इस्लाम की प्रजातान्त्रिक और उदार भावनाओं ने भक्ति-आन्दोलन को विशेष रूप से प्रभावित किया। परन्तु यह मत तर्क-संगत नहीं है। वास्तव में भक्ति की परम्परा भारत में काफी पुरानी है। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव का कथन है कि ” भक्ति-आन्दोलन पूर्णरूप से नया नहीं था और न इसकी उत्पति का मूल कारण इस्लाम था जैसा कि भ्रमवश कुछ आधुनिक लेखकों ने समझ रखा है।

वास्तव में हुआ यह कि मूर्ति-पूजा के शत्रु मुस्लिम धर्म-प्रचारकों, जिन्होंने हिन्दू धर्म तथा विचारों का खण्डन किया, की उपस्थिति के कारण इस आन्दोलन को अधिक प्रेरणा मिली।” अतः यह कहा जा सकता है कि भक्ति-आन्दोलन की उत्पति तो इस्लाम से प्रभावित नहीं थी, परन्तु इस्लाम के आगमन से इस आन्दोलन को प्रोत्साहन मिला।

दिनकर का कथन है कि “कुछ तो इस्लाम का धक्का खाने से घबरा कर और कुछ सूफियों के प्रभाव में आकर हिन्दुत्व जागा और जागकर अपने रूप को सुधारने लगे।’भक्ति आन्दोलन का विकाससेभारत में भक्ति परम्परा बहुत ही प्राचीन है। कुछ विद्वान तो इसे आर्येतर तत्व मानते हैं। सिन्धु घाटी की खुदाई में प्रतिमा-पूजन के कुछ चिह्न मिले हैं। वैदिक परम्परा में भी भक्ति की भावना मिलती है। वेदों में सूर्य, इंद्र, वरुण आदि देवताओं की श्रद्धापूर्ण स्मृतियाँ मिलती हैं। गीता की रचना के समय तो भक्ति आर्य संस्कृति का अंग बन चुकी थी। ईसा के पूर्व ही भागवत धर्म का उदय हो चुका था और उसके साथ ही व्यक्ति का रूप स्पष्ट हो चुका था।

भक्ति परम्परा का प्रारंभिक विकास दक्षिण भारत में हुआ। छठी शताब्दी ई.पू. से नवीं शताब्दी ई.पू. के बीच दक्षिण भारत में आलवार सन्तों ने भक्ति-मार्ग का प्रचार किया। भागवत में भक्ति के मुख कहलाया गया है कि “मैं द्रविड़ देश में जन्मी, कर्नाटक में विकसित हुई। कुछ समय महाराष्ट्र में रही और गुजरात पहुंचकर मैं जीर्ण हो गई।” इस प्रकार दक्षिण भारत में विकसित हुई यह भक्ति-परम्परा मध्यकाल में उत्तर भारत में आयी और सन्त रामानन्द आदि के आगे यहाँ उसका प्रचार हुआ।

मध्ययुग में जब मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों के कारण हिन्दुओं में निराशा एवं पलायनवाद की भावना उत्पन्न हो गई थी, उस समय साधु-सन्तों ने निराश हिन्दुओं के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम व आस्था पुनः उत्पन्न करने के लिए भक्ति-मार्ग जैसा सरल सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इससे भक्ति आन्दोलन की धारा तीव्र गति से बहने लगी। ग्रियर्सन का कथन है कि “हम अपने को ऐसे धार्मिक आन्दोलन में पाते हैं जो उन सभी आन्दोलनों से कहीं अधिक व्यापक है जिसे भारतवर्ष में कभी देखा है।”भक्ति आन्दोलन की विशेषताएँभक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) ईश्वर की एकता-भक्ति आन्दोलन के अधिकांश सन्तों ने ईश्वर की एकता पर बल दिया। एकेश्वरवाद इन सन्तों की शिक्षाओं का मूल मत था। सभी सुधारक और प्रचारक इस बात पर सहमत थे कि ईश्वर एक है जिसे लोग राम, विष्णु, अल्लाह आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं।

(2) पाखण्डों और आडम्बरों का खण्डन-भक्ति आन्दोलन के प्रायः सभी सन्तों ने पाखण्डों और बाह्य आडम्बरों का खण्डन किया और शुद्ध आचरण और विचारों की पवित्रता पर विशेष बल दिया। सभी ने कर्मकाण्डों और आडम्बरों को निरर्थक बलताया तथा चरित्र एवं भाव की शुद्धता पर एक स्वर से बल दिया।

भारतीय संस्कृति के मूल

(3) साम्प्रदायिकता का अभाव-भक्ति आन्दोलन के अधिकांश सन्त असाम्प्रदायिक थे। वे किसी भी सम्प्रदाय अथवा अंधविश्वास के कट्टर अनुयायी नहीं थे। सभी सन्तों ने कट्टरता और अंधविश्वास के स्थान पर उदार दृष्टि पर बल दिया। कबीर, नानक आदि सन्त समन्वयकारी सन्त थे

(4) जात-पात और ऊँच-नीच के भेदभाव का खण्डन-भक्तिकाल के सभी सन्त सामाजिक समानता के समर्थक थे। इन सन्तों ने निम्न जाति के लोगों को अपने सम्प्रदाय में दीक्षित किया और उन्हें भक्ति-मार्ग का अधिकारी बताया। उन्होंने कहा कि “जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई ।

(5) हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल-भक्ति आन्दोलन के अनेक सन्तों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया। कबीर, नानक आदि सन्तों ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच भेद की खाई को पाटने का प्रयास किया। उन्होंने राम रहीम और अल्लाह में कोई भेद नहीं माना।(6) गुरु की महत्ता-भक्ति आन्दोलन के सभी सन्तों ने गुरु की महत्ता पर जोर दिया। उनका यह मत था कि ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु की सहायता आवश्यक है। गुरु ही मनुष्य की आत्मा को जगाता है और सेवा, प्रेम तथा भक्ति के मार्ग पर चलाता है। कबीर ने गुरु को ईश्वर से अधिक पूज्य माना है।

(7) नाम की महिमा, स्तुति और सत्संग-भक्ति-भावना के विकास के लिए भगवान के नाम का स्मरण अत्यन्त आवश्यक है। भगवान के नाम का स्मरण करने से मन में पवित्रता के भावों का उदय होता है, पापों का विनाश होता है। भगवान के भक्तों को शुद्ध हृदय से भगवान की स्तुति करनी चाहिए। यह स्तुति वह दासभाव अथवा सखा भाव दोनों से कर सकता है। भजन-कीर्तन भी स्तुति में शामिल है।

(8) मोक्ष का साधन भक्ति-भक्ति आन्दोलन के प्रचारक ने ईश्वर भक्ति को मोक्ष प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन मानते थे। उन्होंने स्वार्थरहित भक्ति और अनन्य श्रद्धा रखने पर बल दिया ।

(9) शुद्ध कर्मों और सद्गुणों के विकास पर बल-भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने निष्काम भक्ति को श्रेष्ठ बताया। वही व्यक्ति पूर्ण भक्ति-भावना का विकास कर सकता है जो सांसारिक लोभ, मोह, काम, क्रोध अहंकार आदि का परित्याग कर पूर्ण तन्मयता से अपने आराध्यदेव का ध्यान करता है।

(10) ज्ञान की प्राप्ति-भक्ति आन्दोलन के सन्तों की यह मान्यता थी कि ईश्वर के सामने पूर्ण रूप से आत्म-समर्पण किये बिना ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

(11) राज्याश्रयरहित आन्दोलन-भक्ति आन्दोलन की यह प्रमुख विशेषता थी कि यह राज्याश्रय रहित आन्दोलन था। इसके अधिकांश सन्त और चारक समाज के निम्न वर्ग से आए। उन्हें राजदरबार से कुछ लेना-देना नहीं था।भक्ति आन्दोलन का प्रभाव अथवा भक्ति आन्दोलन का महत्वभक्ति आन्दोलन एक देशव्यापी व लोकप्रिय जन-आन्दोलन था। इसने जनसाधारण को अत्यधिक प्रभावित किया। सुधारकों व भक्ति आन्दोलन के उपदेशकों ने अपने प्रगतिशील विचारों से भारत में चेतना की लहर पैदा कर दी।

डॉ. श्रीवास्तव का कथन है कि “भक्ति आन्दोलन एक देशव्यापी आन्दोलन था जिसका सारे देश में प्रचार हुआ। इस भक्ति आन्दोलन के अलावा भारत के गम्भीर पतन के बाद भी इतना व्यापक और लोकप्रिय अन्य कोई आन्दोलन नहीं हुआ ।” भक्ति आन्दोलन के निम्नलिखित प्रमुख प्रभाव पड़े-

(1) धार्मिक सहिष्णुता का उदय-इस आन्दोलन ने विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों में धार्मिक सहिष्णुता का भाव पैदा किया। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप ही हिन्दू और मुसलमान अपनी धार्मिक कट्टरता को त्याग कर आपस में समीप आने लगे और दोनों धर्मों में प्रेम-भावना का संचार हुआ व दोनों धर्मों में समन्वय के भाव पैदा हुए।

(2) सामाजिक समानता – भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप हिन्दू समाज में दीर्घकाल से चली आ रही जाति-पाति व ऊंच-नीच की भावनाओं पर भी कुठाराघात हुआ और जाति-पांति के बन्धन ढीले पड़े और समाज में समानता के भावों का प्रसार हुआ। इस आन्दोलन ने निम्न जाति के लोगों व शूद्रों के लिए भी मुक्ति के द्वार खोल दिये। उनमें आत्मविश्वास व आत्मसम्मान की भावनाएँ जागृत हुईं।

(3) धार्मिक पाखण्डों व कर्म-काण्डों में शिथिलता-भक्ति आन्दोलन के फलस्वरूप ही धार्मिक पाखण्डों एवं कर्म-काण्डों में शिथिलता आई। इस आन्दोलन ने हिन्दू समाज में फैली कुरीतियों और अन्धविश्वासों को दूर करने का प्रयास किया। इससे जनसाधारण फालतू के धार्मिक कर्म-काण्डों और अन्ध-विश्वासों को त्याग कर शुद्ध आचरण करने लगे ।

(4) निराश हिन्दू जनता में नवीन शक्ति का संचार-भक्ति आन्दोलन ने निराश हिन्दू जनता में नवीन शक्ति की लहर पैदा कर दी। इसने पूरे शोषित वर्ग को मिला कर एक कर दिया और उनमें एक अद्भुत शक्ति पैदा कर दी। इस आन्दोलन के फलस्वरूप ही हिन्दू धर्म अपनी रक्षा करने में सफल हो सका ।

(5) एक स्वस्थ समाज का निर्माण-इस आन्दोलन के फलस्वरूप मूर्ति-पूजा, अन्धविश्वास, बाल-हत्या, सतीप्रथा, दासता, धार्मिक कर्म-काण्डों इत्यादि का प्रबल रूप से खण्डन हुआ जिससे समाज अधिक स्वस्थ बना ।

(6) राजनैतिक प्रभाव – इस आन्दोलन ने मराठों और सिक्खों जैसी नैतिक जातियों को जन्म दिया जिन्होंने मुगलों का सामना किया। इसी आन्दोलन के सहारे विजयनगर जैसे सबल हिन्दू साम्राज्य का निर्माण सम्भव हो सका ।

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