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भारतीय संस्कृति में पुराणों का क्या महत्त्व है ?

भूमिका और परिचय- भारतीय परम्परा में यह माना जाता है कि पुराण साहित्य का उद्भव वैदिक साहित्य के साथ ही हुआ। वैदिक साहित्य में पुराण का स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है । विष्णुपुराण तथा भागवतपुराण में 18 पुराणों का उल्लेख मिलता है। इनके नाम हैं— (i) ब्रह्मपुराण, (ii) विष्णुपुराण, (iii) पदमपुराण, (iv) शिवपुराण, (v) भागवतपुराण, (vi) नारदपुराण, (vii) अग्निपुराण, (viii) मार्कण्डेयपुराण, (ix) भविष्यपुराण, (x) ब्रह्मवैवर्तपुराण, (xi) लिंगपुराण, (xii) वामनपुराण, (xiii) वराहपुराण, (xiv) कर्मपुराण, (xv) गरुड़पुराण, (xvi) मत्स्यपुराण, (xvii) ब्रह्माण्डपुराण, तथा (xviii) स्कन्दपुराण ।

पुराणों की विषयवस्तु-पुराणों की विषयवस्तु को पाँच भागों में बाँटा जा सकता है-

(i) सर्ग-सृष्टि की उत्पत्ति से सम्बन्धित ।

(ii) प्रतिसर्ग-प्रलय से सम्बन्धित ।

(iii) वंश – ऋषियों की वंशावली से सम्बन्धित ।

(iv) मन्वन्तर – काल गणना से सम्बन्धित ।

(v) वंशानुचरित – राजाओं की वंशावली तथा चरित्र से सम्बन्धित ।

रचनाकाल

पुराणों की कुछ विषय-सामग्री तीसरी शताब्दी की मानी जाती है परन्तु इनके अधिकांश भागों की रचना प्रथम शताब्दी से लेकर आठवीं शताब्दी के मध्य की मानी जाती है। पौराणिक धर्म की विशेषताएँ

पौराणिक धर्म की विशेषताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है-

1. लोकप्रिय धर्म हिन्दू धर्म- पौराणिक धर्म लोकप्रिय हिन्दू धर्म है। इसका उद्भव तथा विकास वैदिक धर्म से माना जाता है। पुराणों में जिन देवताओं का उल्लेख मिलता है, वे वैदिक देवताओं के परिवार से ही लिए गए हैं। वर्तमान हिन्दू धर्म में धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जो भी बातें देखने को मिलती हैं, उन सभी को पुराणों में सहजता से देखा जा सकता है। पुराणों में विभिन्न देवताओं, देव-परिवारों, भगवान के विभिन्न अवतारों, जप, तप, व्रत, उत्सव, पूजा-पाठ, यज्ञ-विधि-विधान, उपासना विधियाँ इत्यादि का विस्तृत विवरण मिलता है।

2. अवतारवाद-अवतारवाद का सिद्धान्त पौराणिक धर्म का मूलभूत सिद्धान्त रहा है । पुराणों में ही सर्वप्रथम भगवान के अवतारों के मार्गों का उल्लेख मिलता है। पं. बलदेव उपाध्याय का मानना है कि पुराण तथा इतिहास में अवतारों के सम्बन्ध में चार मत देखने को मिलते हैं-

(1) प्रथम मत के अनुसार भगवान अपनी दिव्य मूर्ति का परित्याग करके पृथ्वी पर अवतार लेते हैं।

(2) द्वितीय मत के अनुसार भगवान का केवल एक अंश ही पृथ्वी पर अवतरित होता है ।

(3) तृतीय मतानुसार विष्णु ने अपनी मूर्ति के दो भाग किए। उनमें से एक तो स्वर्ग में विषय में विचार करती है। स्थित रहकर तपस्या करती है तथा दूसरी मूर्ति निद्रा में आश्रित होकर प्रजा के संहार तथा सृष्टि के विषय में विचार करती है

(4) चतुर्थ मत के अनुसार विष्णु के द्वारा अपनी मूर्ति को चार भागों में विभक्त किया गया। इसमें वासुदेव नाम की मूर्ति तो निर्गुण है और शेष तीन-सकेषणा, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध सगुण रूप हैं।

अवतार के उद्देश्य

पौराणिक धर्म में विष्णु के अवतारों के पीछे यह उद्देश्य बताया गया कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब प्रद्युम्न मूर्ति पृथ्वी पर अवतार ग्रहण करके धर्म की प्रतिस्थापना करती है तथा धर्म को क्षति पहुँचाने वालों को नष्ट करती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है-“जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है, अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का विनाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होता हूँ।” महाभारत तथा पुराणों में भी इसी आशय के श्लोकों का उल्लेख मिलता है।

वस्तुतः अवतारवाद के विचार का शुभारम्भ वैदिककाल में ही हो गया था। शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति द्वारा मत्स्य, कूर्म तथा वराह के अवतार लेने का उल्लेख आया है। इसी प्रकार से वैदिक साहित्य में विष्णु के वामन अवतार की बात प्रसिद्ध हो चुकी थी।

अवतारों की संख्या

गीता में दो अवतारों का उल्लेख हुआ है-राम और कृष्ण । महाभारत के नारायणीय पर्व में कंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, राम, दशरथिराम, सात्वत तथा कल्कि नामक दस अवतारों का उल्लेख किया गया है। पुराणों में जिन दस अवतारों का उल्लेख मिलता है, उनमें हंस नामक अवतार के स्थान पर बुद्ध के नाम का उल्लेख मिलता है, शेष सूची सत्य प्रतीत होती है। आज भी हिन्दू धर्म में इन्हीं दस अवतारों को स्वीकार किया जाता है। पद्मपुराण में मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि दस अवतारों का उल्लेख मिलता है ।

3. पौराणिक देवता-प्रमुख रूप से पुराणों में विष्णु, शिव और ब्रह्मा का उल्लेख आया है। इन तीनों देवताओं के मध्य द्वन्द्व की स्थिति दर्शाकर पुराणों में धार्मिक समन्वय की भावना का परिचय दिया गया है। जो पुराण वैष्णव मत से सम्बन्धित हैं, उनमें यद्यपि विष्णु की सर्वोच्चता को प्रतिपादित किया गया है, परन्तु उनमें कहीं पर भी शिव की निन्दा नहीं की गई है। इसी प्रकार, जो पुराण शैव मत से सम्बन्धित हैं, उनमें यद्यपि शिव की सर्वोच्चता को स्वीकार किया गया है लेकिन उनमें कहीं भी विष्णु की निन्दा नहीं की गई है।

पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु व शिव को एक मानने के पीछे यह समन्वयवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है। नारदपुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो व्यक्ति हरि (विष्णु), शंकर या ब्रह्मा के मध्य भेद करता है वह नरकगामी होता है। विष्णुपुराण में भी ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव को एक ही परम तत्त्व के विभिन्न रूपों के रूप में अंगीकार किया गया है। शिवपुराण तथा वायुपुराण में शिव के साथ-साथ विष्णु को भी समान रूप से पूज्य बताया गया है।

पुराणों में प्रतिपादित सामाजिक विचार

पुराणों में प्रतिपादित सामाजिक विचारों को निम्न बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता

(1) वर्ण धर्म-पुराणों में वर्ण धर्ग का स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है। विभिन्न पुराणों में वर्णों के कर्त्तव्यों का विधान मिलता है। चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अलावा पुराणों में चाण्डाल, पुल्कस, निषाद, किरात इत्यादि का उल्लेख भी मिलता है। अध्ययन, दान एवं यज्ञ इत्यादि को पुराणों में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों का कर्त्तव्य बताया गया है। पुराणों में ब्राह्मणों को वरीयता प्रदान करते हुए उन्हें पूजनीय बताया गया है तथा उनको दान देने की महिमा का बखान किया गया है।

अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना, दान लेना इत्यादि ब्राह्मणों के विशेषाधिकार बताए गए हैं, जबकि प्रजा के जीवन व धन की रक्षा करना क्षत्रियों के कर्त्तव्य बताए हैं। कृषि, पशुपालन, व्यापार और वाणिज्य सम्बन्धी क्रियाकलाप वैश्यों के लिए बताए गए है शूद्र समाज में सबसे निम्न स्तर पर थे।

(2) आश्रम धर्म-पुराणों में वर्ण धर्म के साथ-साथ आश्रम धर्म का उल्लेख भी मिलता है। पुराणों में चार आश्रम – ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम तथा संन्यासाश्रम का उल्लेख मिलता है। इनमें ब्रह्मचर्य आश्रम का शुभारम्भ उपनयन संस्कार से होता है। इसमें ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य, अनुशासन, चरित्र-निर्माण, स्वाध्याय का पालन करता हुआ विध्याध्ययन करता पूरा है। गृहस्थाश्रम में मनुष्य विवाह करने के साथ ही पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों को करता है।

गृहस्थाश्रम के बाद व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। इस आश्रम में व्यक्ति का जीवन पवित्र तथा साधनामय होता है। इसमें व्यक्ति परिवार के प्रति माया-मोह को कम करने का प्रयास करता है। संन्यास आश्रम में व्यक्ति समस्त प्रकार के सांसारिक बन्धनों का परित्याग करके भगवान के प्रति समर्पित होकर मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। धर्मशास्त्रों में शूद्रों के लिए संन्यास आश्रम को वर्जित बताया गया है। लेकिन मार्कण्डेय पुराण में एक शूद्र तपस्वी का उल्लेख आया है।

(3) स्त्रियों की स्थिति-पुराणों में स्त्रियों की स्थिति के बारे में भी जानकारी मिलती है। पुराणों में स्त्री को अपने पति की सेविका बताया गया है । पतिव्रता स्त्री की पुराणों में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। पुराणों में प्रायः स्त्रियों के उपनयन तथा शिक्षा का उल्लेख नहीं मिलता ।

परन्तु मार्कण्डेय पुराण में मदालता नामक एक स्त्री को अपने पुत्र को पढ़ाते हुए दिखाया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि समाज में कुछ स्त्रियाँ अवश्य शिक्षित होती होंगी। विधवाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं थी । सती प्रथा का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। पुराणों में विवाह के प्रकारों के अलावा अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों का उल्लेख मिलता है। परन्तु जो पुत्र प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न होते थे, उन्हें समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। पुराणों में दासप्रथा का उल्लेख भी मिलता है ।

(4) खानपान –भोजन तथा पेय पदार्थों के सम्बन्ध में पुराणों में उदार दृष्टिकोण मिलता है। श्राद्ध के समय अनेक पशु-पक्षियों का माँस खाया जाता था। पौराणिक समाज में माँस भक्षण को बुरा नहीं माना जाता था। सुरापान का प्रचलन भी पौराणिक समाज में प्रचलित था। पुराणों में सामाजिक उत्सवों तथा गोष्ठियों में सुरापान करने तथा ताम्बूल (पान) खाने का उल्लेख मिलता है ।

(5) नैतिकता पर बल-पुराणों में नैतिकता पर विशेष बल दिया गया है। तीर्थ, व्रत, उपवास,दान इत्यादि का महत्त्व पुराणों में प्रतिपादित किया गया है। पौराणिक समाज में लोगों के शुद्ध एवं नैतिक जीवन पर विशेष जोर दिया जाता था। पुराणों में पाप कर्म करने तथा उनसे मिलने वाली नारकीय यंत्रणाओं का वर्णन मिलता है। दूसरी ओर पवित्र कर्मों को करने पर इहलौकिक व पारलौकिक सुखों का बखान किया गया है। वस्तुतः इन सबका मूल उद्देश्य मनुष्य को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना था।

(6) शूद्रों के प्रति क्रान्तिकारी दृष्टिकोण – सामाजिक दृष्टिकोण से पुराणों में शूद्रों के प्रति क्रान्तिकारी दृष्टिकोण मिलता है। देवी भागवत में उल्लेख आया है कि स्त्रियों तथा शूद्रों के लिए वेद नहीं हैं। अतः उन्हीं की भलाई के उद्देश्य से व्यास जी ने कृपा करके पुराणों की रचना की। इस प्रकार से पुराणों की रचना करने का एक मुख्य प्रयोजन स्त्रियों, शूद्रों तथा केवल जाति मात्र से द्विजों को धर्म की शिक्षा प्रदान करना था। पुराणों में सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान को प्रतिष्ठित करके उन्हें स्वियों एवं शूद्रों तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। इसीलिए पुराणों में वैदिक ज्ञान के कई रूप देखने को मिलते हैं।

(7) पौराणिक शिक्षा-प्राचीन भारत में प्रचलित शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य व्यक्ति को भवचक्र से मुक्ति दिलवाना था। अतः इसी के अनुरूप पौराणिक शिक्षा का भी यही उद्देश्य रहा है। प्राचीन भारत में शूद्रों तथा स्त्रियों को उपनयन के अधिकार से वंचित रखा गया था। इसलिए इन्हें आश्रमों में रहकर शिक्षा प्राप्ति से वंचित रखा गया। समाज के इन उपेक्षित वर्गों को शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता महसूस की गई। इस पावन कार्य को सूतवर्ग के द्वारा संभाला गया। अतः इस वर्ग के लोग पुराणों में सुरक्षित वैदिक ज्ञान का जन-सामान्य लोगों में प्रचार-प्रसार करने लग गए।

प्रारम्भ में सूत लोग सात शब्दों में आख्यानों को प्रस्तुत किया करते थे, तत्पश्चात् उनके पात्रों की प्रतीकात्मकता के माध्यम से धर्म और दर्शन के विविध पक्षों से, जनसामान्य लोगों को परिचित करवाया करते थे। इन लोगों द्वारा कहानियों के माध्यम से भी लोगों को शिक्षा प्रदान की जाती थी। पुराणों की इस मौखिक शिक्षा से लोग काफी लाभान्वित हुए। पुराणों की इस शिक्षा प्रणाली की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अनपढ़ होते हुए भी ग्रामीण हिन्दू तत्कालीन समय में आत्मा, ब्रह्म, इहलोक तथा परलोक की बातें अच्छी प्रकार से समझते थे।

पौराणिक शिक्षा का लक्ष्य भी ‘भवचक्र’ से मुक्ति पाना है परन्तु यहाँ मुक्ति का अर्थ ‘ब्रह्म ज्ञान’ नहीं है। मुक्ति का एक अन्य अर्थ बड़े आग्रह के साथ ईश्वर की प्राप्ति बताया गया है। पुराणों में नव लक्षण भक्ति को मुक्ति का साधन बताकर, मुक्ति प्राप्ति का उपाय बताया गया है। वैदिक ज्ञान का मार्ग योग का मार्ग था परन्तु पौराणिक चिन्तन व शिक्षा का मार्ग भक्ति का मार्ग है। पुराणों में तीर्थयात्रा, व्रत, उपासना, पूजा, पाठ, दान, दक्षिणा इत्यादि के महत्त्व का प्रतिपादन किया गया है।

वैदिक शिक्षा के समान पौराणिक शिक्षा भी मौखिक परम्परा पर आधारित थी। मौखिक रूप से पुराण सुनने का कार्य चौथी शताब्दी ईसा पूर्व आरम्भ हो गया था। कौटिल्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में राजा को पुराण तथा इतिहास नियमित रूप से सुनने का परामर्श दिया है। मनु ने भी ‘मनुस्मृति’ में पितृ श्राद्ध के अवसर पर पुराण श्रवण का विधान किया है।

पुराणों की उपादेयता अथवा पुराणों का महत्त्व

पुराणों के महत्व तथा उपादेयता को निम्न बिन्दुओं के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) पुराणों से समकालीन भारतीय समाज व संस्कृति के विभिन्न पक्षों की सटीक व रोचक जानकारी प्राप्त होती है।

(ii) समकालीन समाज में वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, संस्कार, पुरुषार्थ इत्यादि से सम्बन्धित जानकारी भी पुराणों से प्राप्त होती है।

(iii) पुराणों से प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों का संक्षिप्त परिचय तथा विभिन्न कालों से सम्बन्धित राजनीतिक घटनाओं के बारे में भी हमें जानकारी प्राप्त होती है।

(iv) पुराणों से विभिन्न प्रकार की विधाएँ-शिल्प-कला, भवन निर्माण-कला, आयुर्वेद, भूगोल, नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

(v) पुराणों का श्रवण व मनन करने से इहलौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही प्रकार के लक्ष्यों की पूर्ति होती है।

सबसे प्राचीन पुराण कौनसा है?

मत्स्य पुराण सबसे प्राचीन पुराण है