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भौगोलिक प्रदेश की संकल्पना का विवेचना करते हुए आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए

प्रदेश संकल्पना- भूगोल में अब तक की विचारधाराओं के अनुसार प्रदेश भूगोल सम्बन्धी तीन प्रदेशों की संकल्पना एक ही जैसी प्रतीत होती है, वे प्रदेश हैं-

  1. प्राकृतिक प्रदेश,
  2. भौगोलिक प्रदेश,
  3. कम्पेज ।

वैसे भूगोल में प्रदेश के वर्गीकरण में भूगोलविदों द्वारा लक्षणों एवं कार्यों के आधार पर प्रदेशों का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है—

1. सामान्य या जातीय प्रदेश (Generic Regions)

एक सामान्य गुण वाले जो प्रकृति में भी समरूप होते हैं, जातीय या समान प्रदेश कहलाते हैं। इस प्रकार के प्रदेश पृथ्वीतल पर पृथक्-पृथक् पाए जाते हैं जैसे मानसूनी जलवायु प्रदेश, सवाना प्रदेश, टैगा प्रदेश आदि ।

2. विशिष्ट प्रदेश (Specific Regions)

विशिष्ट प्रदेश एक ऐसा क्षेत्र है जिनका निश्चित रूप से एक ही नाम होता है। इसका निर्धारण केवल भौतिक तत्त्वों के आधार पर हीं नहीं होता है वरन् मानवीय क्रिया-कलापों की विभिन्नताओं के अधार पर भी किया जाता है। विशिष्ट प्रदेश अपने आकार, संरचना, आकृति, प्रतिरूप तथा विशिष्ट क्रियाओं द्वारा निर्धारित होता These areas are out come of intense human activity and terrestrial मुख्यतः विश्व के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में मिलते हैं। ये मुख्यतया एक देशीय (Unique) होते हैं, जिनके आकारों में कई तथ्यों से समानता स्थापित होती है । जातीय व विशिष्ट प्रदेश एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। जातीय प्रदेश पृथ्वीतल पर जगह-जगह पाए जाते हैं। जबकि विशिष्ट प्रदेश केवल एक । ही स्थान पर मिलते

3. आकृतिक या रूपात्मक प्रदेश (Formal Regions)

यह एक ऐसी क्षेत्रीय इकाई है जिसमें सर्वत्र किसी एक लक्षण की समरूपता होती है, जैसे हिमालय पर्वतीय भाग, गंगा का विशाल मैदनी प्रदेश आदि । रूपात्मक प्रदेश का क्षेत्र विशाल होता है जिसमें सामान्यीकरण प्रबल रहता है और समरूपता या एकता का आंशिक स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में बार-बार दृष्टिगोचर हो सकता है और उसी विशाल क्षेत्र के अन्य भागों में मानवीय, सांस्कृति एवं आर्थिक क्रियाओं में विभिन्नता भी मिलती है जिससे उस विशाल प्रदेश में एकता का रूप भी बदला हुआ मिलता है।

4. कार्यात्मक या कर्मोपक्षी प्रदेश (Functional Regions)

कार्यात्मक प्रदेश न तो रूपात्मक प्रदेश (Formal Regions) की भाँति समांगी क्षेत्र होता है और न उसमें सामान्यीकरण होता है परन्तु उसमें सर्वत्र एक-से कार्य या संगठन की संमांगता होती है और समस्त क्षेत्र किसी विशेष गत्यात्मक कार्य द्वारा आपस में सम्बद्ध होता है। इस प्रकार कार्यात्मक प्रदेश ‘एकता में विविधता’ का ज्वलंत उदाहरण है। हार्टशोर्न ने कार्यात्मक प्रदेश की व्याख्या इस प्रकार की है-“The Functional Region is not a descriptive generalization of character but rather the expression of a theory of process relationship a generalization in a logical sense.”

बेरी व हाकिन्स की कार्यात्मक प्रदेश की व्याख्या इस प्रकार है-

“A Region of coherent organization of a Functional Region is defined as one in which one or more phonomena of Moment Connect the localities whithin it into a functionally organized whole.”

इस तरह कार्यात्मक प्रदेश के अवयव एक साथ अपना कार्य करते हैं तथा अन्योन्याश्रित होते हैं। इस प्रदेश में मानवीय क्रियाएँ सम्बद्ध रहती हैं।

5. प्राकृतिक प्रदेश (Natural Region)

सामान्य अर्थों में प्राकृतिक प्रदेशों का सीधा सम्बन्ध प्राकृतिक परिवेश से ही होता है परन्तु काण्ट, हम्बोल्ट एवं रिटर ने प्रकृति के अन्तर्गत मानव और मानवीय क्रियाओं को भी शामिल कर लिया और प्राकृतिक प्रदेशों के अध्ययन का विकास व विस्तार किया । भूतल ग्लोब का अंग प्रकृति की क्रिया तथा उसका कर्म क्षेत्र है जिसमें विविधता प्रत्यक्ष रूप में प्रमाणित होती है। अतः हरबर्टसन में प्राकृतिक परिवेश के तत्त्वों जैसे वनस्पति, पशु सम्पदा, धरातल, स्थिति, जलवायु आदि की साम्यता पर आधारित प्रदेशों को

समूहीकृत किया और पहले उन्हें वृहद् प्राकृतिक प्रदेश (Major Natural Region) और क आधार प्राकृतिक परिवेश था अतः बाद में इन प्रदेशों को जलवायु एवं वनस्पति प्रदेश में प्राकृतिक प्रदेश (Natural Region) नाम दिया। हरबर्टसन के समूहीकरण या वर्गीकरण क (Climate Vegetation Regions) भी कहा गया। हरबर्टसन के अनुसार, भूतल का ऐ कोई क्षेत्र जहाँ प्राकृतिक परिवेश के तत्त्व मानव क्रियाओं को प्रभावित करते हैं, एक प्राकृतिक प्रदेश है।” परन्तु बाद में ऐसे प्राकृतिक परिवेश के प्रभाव से निर्मित मानवीय क्रियाकलापों एवं सांस्कृतिक दृश्यभूमि (Cultural Landscape) को भी महत्त्व प्राप्त हुआ, जिससे कालान्तर में भूगोल में दृश्यभूमि (Landscape) की अवधारणा व चिन्तन का विकास हुआ।

6. भौगोलिक प्रदेश (Geographical Regions)

भौगोलिक प्रदेशों में भौतिक सांस्कृतिक व सामाजिक अभिलक्षणों की समानता होती है। ऐसे प्रदेशों का निर्माण विभिन्न • भौगोलिक तत्त्वों के आधार पर तथा भूगोल के दो या अधिक तत्त्वों के पारस्परिक संबंधों के आधार पर होता है। इसके आधार पर किसी भौतिक समानताओं के प्रदेश में जितनी दूर तक के विस्तृत क्षेत्रों के आर्थिक व्यवसायों की समांगकता पाई जाती है, उन सभी क्षेत्रों को मिलाकर भौगोलिक प्रदेश का निर्माण होता है। विभिन्न भौगोलिक तत्त्वों के आधार पर प्रादेशिक वर्गीकरण किया जाता है जैसे उच्चावच पर आधारित पर्वतीय प्रदेश।

इसी तरह भिन्न-भिन्न मृदओं के आधार पर मृदा प्रदेश है और शैलों की रचनाओं के आधार पर शैलिक प्रदेश बनते हैं। आर्थिक क्रियाओं के आधार पर कृषि प्रदेश, पशुचारण एवं निर्माण उद्योग प्रदेश होते हैं। भूगोल के दो या अधिक तत्त्वों के पारस्परिक संबंध पर आधारित प्रदेश का उदाहरण टैगा प्रदेश है, जो जलवायु, मिट्टी, वनस्पति तथा आंतरिक संरचना के तत्त्वों पर आधारित है।

कम्पेज या पूर्ण प्रदेश (Compage)

कम्पेज या पूर्ण प्रदेश का निर्धारण समस्त भौतिक एवं जैव लक्षणों तथा सांस्कृतिक कारणों द्वारा होता है तथा ये सभी कारक कार्यात्मक रूप से मानव व्यवसायों से सम्बद्ध होते हैं। कम्पेज का अर्थ स्वेच्छानुरूप, असीमित एवं अनिश्चित होता है। कम्पेज को पूर्ण प्रदेश (Total Region) मानते हैं। कम्पेज प्रदेश अत्यधिक जटिल प्रदेश होता है किन्तु उसमें तत्त्व समिश्र की एकता होती है।

प्राकृतिक प्रदेश, भौगोलिक प्रदेश व कम्पेज

जिस अर्थ में प्राकृतिक प्रदेश शब्द प्रारम्भ प्रयुक्त हुआ तब से उसकी आलोचना होने लगी। अतः आलोचना से मुक्ति पाने हेतु इस शब्द को व्यापक अर्थ प्रदा करने के लिए इसके स्थान पर ब्रिटेन के विद्वानों ने भौगोलिक प्रदेश शब्द का प्रयोग किया, जिसे भूगोलवेत्ताओं ने भूतल की इकाई विशेष का अध्ययन करने हेतु प्रदेशों का वर्गीकरण करने में तकनीकी दृष्टि से अधिक उपयुक्त माना। हार्टशोर्न के मतानुसार भौगोलिक प्रदेश में एक तत्त्व प्रधान एवं बहुप्रकरण (Topics) वाले प्रदेशों को लिया जा सकता है ।

भौगोलिक प्रदेश व कम्पेज में कुछ साम्यता इस दृष्टि से हो सकती है कि जब उसमें एक साथ मानवीय तत्त्वों की, उनका महत्त्व एवं प्रदेश में व्यापकता के अनुसार व्याख्या भौगोलिक प्रदेश के अनुसार की जाए परन्तु कम्पेज में अध्ययन का केन्द्र मानवीय लक्षणों और उनके कार्यकलापों को माना गया है, क्योंकि एक प्रदेश में विकसित सांस्कृतिक दृश्य भूमि है जबकि विश्व के अधिकांश देशों व प्रदेशों में अथवा भूतल के एक बहुत बड़े भाग में शत-प्रतिशत, दृश्य भूमि न तो विकसित हो पाई है और न ही उसके निकट भविष्य में विकसित होने की कोई संभावना ही है। अतः भौगोलिक प्रदेश प्राकृतिक प्रदेशों और कम्पेज के मध्य एक महत्त्वपूर्ण चयन है, जो वर्तमान स्थिति में सर्वाधिक उपयक्त हो सकता है।

प्रदेश संकल्पना की समालोचना

भूगोल में प्रदेश संकल्पना पर प्रायः सभी विद्वानों ने विविधतापरक अध्ययन व शोध प्रस्तुत किए और उनके विषय में उसके चिन्तन एवं संकल्पना पर बहुत कुछ लिखा गया है ये समस्त कार्य इतने अधिक भिन्न लक्षणीय व विभिन्नता लिए हुए हैं कि वह भिन्नता ही अभिशाप बन गई है। प्रादेशिक संकल्पना की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की गई-

1. प्रदेशों की धारणा प्रमुखतः पूर्वकालीन भूगोल से सम्बन्धित बताई जाती है, जिसमें ऐतिहासिक भूगोल का विशेष समावेश मिलता है परन्तु इस आलोचना में सार नहीं है क्योंकि प्रदेशों के अध्ययन में भूतकाल के आधार पर भविष्य के विकास और विकास की संभावनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है ।

2. प्रदेशों की सीमाएँ अनिश्चित होना आलोचना का एक आधार है परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि भूगोल में कोई भी विभाजन कमरे की दीवारों की भाँति नहीं हो सकता।

3. प्रदेशों के विभाजन की विधि-समरूपों, स्थिर अथवा असम्बद्ध भूतल के इकाई क्षेत्रों को समझाने की विधि है। अतः ऐसे प्रदेश अव्यावहारिक एवं काल्पनिक हैं परन्तु आज के विद्वानों ने जिस सूक्ष्म विधि से अपने अध्ययन प्रस्तुत किए हैं उनके आधार पर यह आलोचना तथ्यात्मक प्रतीत नहीं होती है।.

4. प्रदेश की संकल्पना यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के विकसित प्रदेशों के लिए विशेष प्रामाणिक है। यह आलोचना निस्सार है क्योंकि प्रदेश का निर्धारण स्वतः ही विकास के स्वरूप अनुरूप ही होगा और जिस सूक्ष्म विधि से इन विकसित प्रदेशों का वहाँ लक्षित प्रकरणों का अध्ययन किया जाता है उसी सूक्ष्म विधि से विकासशील व अविकसित देशों का भी अध्ययन किया जाता है

5. प्रादेशिक संकल्पना के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि यदि यह कोई धारणा है भी तो अधूरी है और सबसे पुरानी होते हुए भी बिगड़े हुए बालक के समान है।

6. प्रदेश शब्द के बेरहमी से किए गए प्रयोग ने उसे भ्रामकता का प्रतीक बना दिया है। पहले प्राकृतिक प्रदेश, फिर भौगोलिक प्रदेश और आजकल प्रदेश का नवीन मौलिक अर्थ ‘कम्पेज’ पर बल दिया जाता है। इसी प्रकार भविष्य में पुनः किसी नवीन शब्द की खोज की जा सकती है जो उसकी अनिश्चितता का प्रतीक है ।

इतना सब होते हुए भी आज यह स्थिति अवश्य है कि भूगोल में अभी तक प्रदेश शब्द अपरिहार्य बना हुआ है। इसके साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि प्रादेशिक भूगोल के अध्ययन से प्रदेश विशेष का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है अतः वह उपयोग रहित नहीं हो सकता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि भूगोल में प्रदेश निश्चित अर्थों वाली इकाई है जिसका प्रायः निश्चित क्षेत्रीय विस्तार होता है अतः यह इकाई तथ्यात्मक है, काल्पनिक नहीं ।

प्रादेशिक अध्ययन में प्रदेश के तत्त्वों के अन्तःमिश्रण एवं निर्मित तत्त्व जटिलताओं के अन्तर्सम्बन्ध, अन्तरों व भिन्नताओं व उनकी सारी व्यवस्थाओं का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाता है और प्रदेशों के स्वरूप आन्तरिक तत्त्वों के गतिशील व क्रियाशील रहने से विकसित हो रहे हैं और इन्हें जैविक इकाई (Biotic Unit) माना जाने लगा है।

अतः प्रादेशिक संकल्पना की जो आलोचना की जाती है, वह निरर्थक-सी प्रतीत होती है।