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गुप्तकाल में विज्ञान के विकास का वर्णन कीजिए Science in the Gupta period

गुप्तकाल में विज्ञान की सर्वाधिक उन्नति हुई। ज्योतिष और गणित के क्षेत्र में गुप्तकाल की महत्त्वपूर्ण देनें हैं। दशमलव पद्धति का विकास गुप्तयुग में ही हुआ। भारत में चिकित्सा पद्धति का गुप्तकाल के पूर्व ही काफी विकास हो चुका था परन्तु गुप्तयुग में उसका संरक्षण एवं संवर्द्धन किया गया। गुप्तकाल में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विकास की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही जिसका विवेचन निम्नलिखित प्रकार किया जा सकता है-

1. ज्योतिष – आर्यभट्ट गुप्तकाल के सुप्रसिद्ध दैवज्ञ थे। आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि की अनुमानित जो माप की थी, वह आज तक प्रायः सही मानी जाती है। पृथ्वी गोल है तथा अपनी धुरी पर घूमती है, को प्रतिपादित करने का श्रेय आर्यभट्ट को ही प्राप्त है। नक्षत्र तथा खगोल विद्याओं के सम्बन्ध में इनकी मान्यताएं काफी सीमा तक शुद्ध है। इन्होंने सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण के विषय में पौराणिक धारणा का साहसपूर्ण खण्डन किया कि इसमें राहु का कोई स्थान नहीं है बल्कि यह चन्द्रमा तथा पृथ्वी की छाया का फल है।

इसी प्रकार वराहमिहिर गुप्तकाल के सबसे प्रसिद्ध ज्योतिषज्ञ थे। उन्होंने छ पुस्तकें लिखी—(1) लघुजातक, (2) वृहज्जातक, (3) विवाहपटल, (4) योग-माया, 6) वृहत्संहिता और (6) पंचसिद्धान्तिका अन्तिम ग्रन्थ में उन्होंने रोमक, वशिष्ठ आदि सिद्धान्तों की विवेचना की है। इनका ‘वृहत्संहिता’ नामक ग्रन्थ ज्ञान-विज्ञान का एक सुविशाल कोष है जिसमें नक्षत्रों की गति तथा मनुष्यों पर उसके प्रभाव, भूगोल, वास्तुकला, मूर्ति-निर्माण, तालाबों को खुदवाने तथा उद्यान-निर्माण कराने की रीतियों, विभिन्न प्रकार की स्त्रियों तथा पशुओं की विशेषताओं और विविध प्रकार के रत्नों आदि विषयों का वर्णन प्राप्त होता है।

‘वृहद्विवाहपटल’ तथा ‘स्वल्पविवाहपटल’ नामक ग्रन्थों में वराहमिहिर ने विवाह के शुभ लग्नों पर विचार किया है। वराहमिहिर ने ज्योतिष विद्या में यूनानियों के ऋण को स्वीकार किया है। ब्रह्मगुप्त भी गुप्तकाल के एक प्रसिद्ध ज्योतिषज्ञ थे। इन्होंने अपने ग्रन्थ ‘ब्रह्म-सिद्धान्त’ की रचना शक संवत् 550 अर्थात् 628 ई. में की।

2. गणित-गुप्तकालीन भारत में गणित की भी उन्नति हुई। इस समय ज्योतिष और गणित एक-दूसरे के साथ काफी घनिष्ठ रूप से मिले हुए थे। इस काल में ज्योतिषज्ञ ही इस समय के प्रमुख गणितज्ञ थे। आर्यभट्ट ऐसे प्रथम विद्वान् थे जिन्होंने गणित को एक पृथक विज्ञान माना। उनकी सबसे प्रधान देन है—उनकी अद्वितीय संख्या पद्धति । संसार के किसी भी प्राचीन देश को दशमलव पद्धति का ज्ञान नहीं था, किन्तु आज सारे संसार में यह प्रचलित है।

यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि आर्यभट्ट ने किसी प्रचलित गणना या संख्या पद्धति का सुधार किया, अथवा इस पद्धति का स्वयं आविष्कार किया। भारतीय संख्या पद्धति के द्वारा सभी विज्ञानों और विशेष रूप से गणित की कितनी उन्नति हुई और इसके अभाव में इनकी कितनी हानि होती यह कहना सरल नहीं है। आर्यभट्ट ने पाई (r) के बिल्कुल ठीक मूल्य 3.14 की भी खोज की। इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त भी एक महान् गणितज्ञ था ।

3. आयुर्वेद तथा रसायनशास्त्र- इनके क्षेत्र में भी गुप्तयुगीन भारत ने महत्त्वपूर्ण प्रगति की। नागार्जुन नामक प्रसिद्ध विद्वान् ने ‘रस-चिकित्सा’ नामक नवीन चिकित्सा-पद्धति का आविष्कार किया जिसने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण क्रान्ति उत्पन्न की। नागार्जुन ने यह सिद्ध किया कि सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि खनिजों में भी रोग-निवारण शक्ति विद्यमान है। ‘पारद’ का भी आविष्कार नागार्जुन ने किया। शिल्पशास्त्र के भी अनेक ग्रन्थों का प्रणयन गुप्तकाल में किया गया।

आर्यभट्ट

आर्यभट्ट का जन्म 476 ई. में कुसुमपुर (पटना) में हुआ था। इन्होंने 23 वर्ष की अवस्था में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘आर्यभट्टीय’ का प्रणयन किया। विज्ञान के क्षेत्र में उनके इस ग्रन्थ का विशेष स्थान है।

आर्यभट्टीय सिद्धान्त-

आर्यभट्टीय ग्रन्थ में कुल 121 श्लोक हैं जो निम्नलिखित चार खण्डों में विभाजित है- (1) गीतिकापाद-यह सबसे छोटा खण्ड़ है जिसमें मात्र 11 श्लोक हैं। इसमें लम्बी संख्याओं को श्लोक में रखने की दृष्टि से अक्षरों के द्वारा संख्या प्रकट करने की नयी रीति का प्रचलन किया गया है। इस पद्धति के अनुसार ‘क’ से लेकर ‘म’ तक के वर्ण क्रमशः 1 से लेकर 25 संख्या के द्योतक हैं। ‘य’ का मूल्य 300 तथा उसके अनन्तर हकार तक सभी वर्णों के मूल्य में 10 की वृद्धि होती गई है।

गीतिकापाद के प्रथम श्लोक में सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, शनि, गुरु, मंगल, शुक्र और बुध के महायुगीन चक्करों की संख्या बतायी गई है क्योंकि उन्होंने पृथ्वी का दैनिक भ्रमण माना है। गीतिकापाद के अन्य श्लोकों में राशि, अंश, कला आदि का सम्बन्ध; आकाश कक्षा का विस्तार, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र की गति; अंगुल, हाथ, पुरुष, योजन का सम्बन्ध; पृथ्वी के व्यास तथा सूर्य, चन्द्र और ग्रहों के बिम्बों के व्यास के परिणाम तथा 3 अंश 45 कला के अन्तरों पर ज्याओं के मानों की सारणी है।

(2) गणितपाद- इसमें 30 श्लोकों में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित के प्रश्न दिये हैं, जिसमें गणित-सम्बन्धी अनेक कठिन प्रश्नों के उत्तर हैं। जैसे—प्रथम श्लोक में अपना नाम व स्थान बताया है। दूसरे श्लोक में संख्या लिखने की दशमलव पद्धति की इकाइयों के नाम हैं। शेष श्लोकों में वर्ग, वर्गक्षेत्र, घन, घनफल, वर्गमूल, घनमूल, त्रिभुज, त्रिभुज का क्षेत्रफल, शंकु का घनफल, वृत्त, वृत्त का क्षेत्रफल व उसका घनफल, विषम चतुर्भुज का क्षेत्रफल, सब प्रकार के क्षेत्रों की मध्यम, चौड़ाई, लम्बाई जानकर क्षेत्रफल निकालने के साधारण नियम दिये हैं।

(3) कालक्रियापाद-इस खण्ड में ज्योतिष सम्बन्धी बातों का वर्णन है। इसमें काल व कोण की इकाइयों का सम्बन्ध तथा मास, वर्ष व युगों के सम्बन्धों को बताया गया है।

(4) गोलपाद-इसमें 50 श्लोक हैं तथा सूर्य व नक्षत्रों के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। जैसे—ग्रहों की गति, ग्रहों के पात और पृथ्वी की छाया से ग्रहों का रविमार्ग पर भ्रमण, सूर्य से कितने अन्तर पर चन्द्रमा, मंगल व बुध, पृथ्वी, ग्रहों और नक्षत्रों का आधा भाग अपनी छाया से अप्रकाशित तथा आधा सूर्य के सामने होने से प्रकाशित है, सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहणों की गणना करने की रीति एवं यह बताया गया है कि जिस प्रकार चलती नाव पर बैठा हुआ मनुष्य किनारे पर स्थित पेड़ों को उल्टी दिशा में चलता हुआ देखता है, उसी प्रकार लंका (भूमध्य रेखा) से स्थित तारे पश्चिम की ओर चलते दिखाई देते हैं।

इस प्रकार आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ ‘आर्यभट्टीय’ में गागर में सागर भर दिया है। अतः विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट का योगदान-

(1) आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ में ज्योतिष सिद्धान्त की प्रायः सभी बातें और उच्च गणित की कुछ बातें सूत्र रूप में लिखी हैं, जिसमें प्रत्येक अक्षर का एक निश्चित मान (संख्या) है।

(2) आर्यभट्ट प्रथम व्यक्ति है जिन्होंने अपने ज्योतिष-सिद्धान्त में निश्चित रूप से एक गणित के अध्याय को सम्मिलित किया है। इसमें अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित के सूत्रों व सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया।

(3) आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि की अनुमानतः जो माप की थी, वह आज तक सही मानी जाती है।

(4) पृथ्वी गोल है तथा अपनी धुरी पर घूमती है, के सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय आर्यभट्ट को है।

(5) आर्यभट्ट ने सूर्य और चन्द्रमा के विषय में पौराणिक धारणाओं का खण्डन किया और कहा कि ग्रहण में राहु-केतू का कोई स्थान नहीं है बल्कि यह चन्द्रमा और पृथ्वी की छाया का फल है।

आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम दशमलव प्रणाली की खोज की जो आधुनिक समय में भी प्रचलित है।

वराहमिहिर

वराहमिहिर अवन्ति (उज्जयिनी) के निवासी थे। इनके जन्म के सम्बन्ध में विद्वानों में मतैक्य का अभाव है। सम्भवतः इनका जन्म 412 शक संवत् में हुआ और इनकी मृत्यु 509 शक संवत् में लगभग 97 वर्ष की आयु में हुई। इस प्रकार वराहमिहिर का काल पांचवी सदी का उत्तरार्द्ध एवं छठी सदी के पूर्वार्द्ध के मध्य माना जाता है। इनके पिता का नाम आदित्यदास था । ‘कायित्य’ ग्राम इनका निवास स्थान था जो वर्तमान में उज्जयिनी के पास ‘कायथा’ नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता ही इनके विद्यागुरु थे। इन्होंने मुख्यतः चार ग्रन्थों की रचना की थी जो निम्नलिखित हैं- 1. पंचसिद्धान्तिका, 2. वृहज्जातक, 3. वृहद्यात्रा, तथा 4. वृहद्विवाहपटल ।

वराहमिहिर के उपर्युक्त चारों ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण हैं। परन्तु इन ग्रन्थों में ‘पंचसिद्धान्तिका’ ग्रंथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें पाँच विभिन्न सिद्धान्तों का परिचय मिलता है। यद्यपि यह है कारणग्रन्थ कहलाता । कारणग्रन्थ का अर्थ है-काम चलाऊ पुस्तक । कारणग्रन्थों में ऐसे नियम दिये होते हैं, जिनमें ज्योतिष की प्रमुख गणनाएँ पूर्णतया शुद्ध न होकर केवल मोटे तौर पर शुद्ध होती है।

किन्तु सिद्धान्त में ऐसे नियम दिये रहते हैं जिनसे उत्तर यथासम्भव शुद्ध निकलता है। परन्तु पंचसिद्धान्तिका में कुछ ऐसे विषय भी हैं जो प्रायः कारण ग्रन्थों में नहीं रहते बल्कि सिद्धान्तग्रन्थों में रहते हैं। डॉ. थीबो और पं. सुधाकर द्विवेदी ने इसका अंग्रेजी अनुवाद व संस्कृत टीका सहित 1889 ई. में प्रकाशित किया था।

‘पंचसिद्धान्तिका’ के सिद्धान्त-

पंचसिद्धान्तिका में पाँच सिद्धान्त हैं जो निम्नलिखित हैं-

1. पितामह-सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार सूर्य और चन्द्रमा का युग 5 वर्ष का होता है। तीन महीने में एक अधिमास होता है और बासठ दिनों में एक तिथि का क्षय होता है।

2. रोमक-सिद्धान्त-इसमें 2850 वर्ष है। एक युग में 1050 अधिमास होते हैं और 16,547 क्षय तिथियाँ हैं। इस प्रकार 2.7 वर्ष में एक अधिमास होता है। इस प्रकार रोमक- सिद्धान्त के अनुसार वर्ष का मान 365 दिन, 5 घंटा, 55 मिनट और 12 सेकेण्ड है।

3. पौलिश-सिद्धान्त-इस सिद्धान्त में वर्ष 365 दिन, 6 घंटा, 12 मिनट का माना है तथा अधिमास कितने-कितने दिनों पर पड़ता है इस तथ्य पर अधिक जोर दिया गया है। इसमें ग्रहों की गणना के नियम भी बताये गये हैं।

4. वसिष्ठ-सिद्धान्त-इसमें राशियों पर प्रकाश डाला गया है, परन्तु सूर्य-चन्द्रमा की मध्यम व स्पष्ट गतियों को इसमें नहीं बताया गया है। वराहमिहिर ने स्वयं वसिष्ठ व पितामह सिद्धान्त को निम्नतम श्रेणी का बताया है।

5. सूर्य-सिद्धान्त-वराहमिहिर के अनुसार सूर्य-सिद्धान्त सबसे उत्तम है। इसमें ग्रहों की मध्यम गति का वर्णन है तथा बताया गया है कि सूर्य, चन्द्रमा तथा बुध समान कोणीय वेग से नहीं चलते परन्तु गणना की सुविधा के लिये यह मान लिया जाता है कि वे समान वेग से चलते हैं।