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रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्यिक उपलब्धियों का वर्णन कीजिए

रवीन्द्रनाथ टैगोर बाल्यकाल से ही बंगला में कविताएँ लिखने लग गये थे। उन्हें कविताएँ लिखने की प्रेरणा उपनिषद्, संस्कृत काव्य-साहित्य तथा प्राचीन एवं मध्यकालीन बंगला साहित्य के वैष्णव गीतों से मिली। हिन्दी के सन्त-साहित्य और बंगाल के लोक-गीतों का प्रभाव उनकी कविताओं में दृष्टिगत होता है।

इतना ही नहीं, पाश्चात्य साहित्य तथा संस्कृत से भी रवीन्द्रनाथ भली-भांति परिचित थे। महाकवि का साहित्य इन विविध प्रेरणाओं से ओत-प्रोत होने के कारण अत्यन्त समृद्ध व अनुपम बन पड़ा है। अपनी आखिरी सांस अर्थात 80 वर्ष की उम्र तक वे कविताएँ लिखते रहे। वे केवल एक कवि ही नहीं, एक महान् शिक्षाशास्त्री भी थे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्यिक उपलब्धियों का वर्णन कीजिए

रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्यिक विरासत

रवीन्द्रनाथ टैगोर का भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। वे भारतीय साहित्य की लगभग पूरी एक शताब्दी का प्रतिनिधित्व करते हैं। अपनी साहित्यिक रचनाओं द्वारा जिस प्रकार वाल्मीकि, व्यास, कालिदास व तुलसीदास ने भारतीय संस्कृति को अति समुन्नत व सुदृढ़ किया उसी प्रकार आधुनिक युग में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी साहित्यिक गतिविधियों से भारतीय संस्कृति का परिष्कृत रूप भारतीय जनता व विदेशियों के सम्मुख रखा।

साहित्य की कोई भी ऐसी विधा नहीं होगी जिस पर रवीन्द्र ने न लिखा हो। उनकी रचनाओं के फलस्वरूप ही बंगला जैसी प्रान्तीय भाषा का साहित्य विश्व-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सका। उनकी साहित्यिक कृतियों को इतना सम्मान दिया गया कि वे विश्व-कवि कहलाये तथा साहित्य के क्षेत्र में उन्हें नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। रवीन्द्रनाथ कवि ही नहीं अपितु महामानव थे। टैगोर की साहित्यिक देन निम्नलिखित है-

1. कवि के रूप में टैगोर बचपन से ही कविताएँ लिखने लगे। 20 वर्ष के होने से पहले ही उनकी ‘गाथा’ नामक एक पुस्तक तथा कुछ कविताएँ एवं कहानियाँ निकल चुकी थीं । उनके काव्य में प्रकृति प्रेम तथा आध्यात्मिक विषयों का प्रमुख रूप से वर्णन है। टैगार ने अनेक कविताएँ गद्य-काव्य की शैली में भी लिखी हैं। उनका काव्य-साहित्य अपार है। उन्होंने अनगिनत प्रेम-गीत तथा कविताएँ लिखी हैं। बंगला साहित्य में देश-प्रेम से पूर्ण कविताएँ भी लिखीं। ‘सोनार नारी’, ‘कथाओं काहिनी’, ‘बलाका’,’उर्वशी’, ‘गीताजंलि’ आदि उनकी उत्कृष्ट काव्य रचनाएँ हैं ।

2. नाटककार-रवीन्द्रनाथ ने अनेक नाटिकाएँ तथा प्रहसन भी लिखे हैं। उनके नाटक संवादमय सरस काव्य बन गये हैं।

3. उपन्यास तथा कहानी साहित्य-रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान् उपन्यासकार भी थे । उनके अनेक उपन्यास सामाजिक हैं। सामाजिक उपन्यासों में अधिकतर मनोवैज्ञानिक हैं। इनमें स्त्री-पुरुषों के मानसिक द्वन्द्वों का मार्मिक चित्रण है। रवीन्द्रनाथ के ‘करुणा’, ‘बड़ी ठकुरानी का हार’, ‘राजर्षि’, ‘चार अध्याय’, ‘आँख की किरकिरी’, ‘नौका डूबी’, ‘घर बाहरे’ आदि प्रमुख उपन्यास है । बंगला में छोटी कहानियाँ लिखना रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही प्रारम्भ किया था। अपने उपन्यास तथा कहानियों में रवीन्द्र ने भारतीय जीवन का मार्मिक चित्रण किया है। उनकी रचनाओं में उनकी भारतीयता बोलती है।

4. बंगला साहित्य के युग-निर्माता-रवीन्द्रनाथ टैगोर की आजीवन साहित्य साधना के फलस्वरूप बंगला साहित्य अपनी कीर्ति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच गया। वे लेखक, समालोचक और अभिनेता सभी थे। उन्होंने बंगला की साधु भाषा को छोड़कर साधारण लोगों की बोलचाल की भाषा को अपनाया और उसमें अद्भुत सौन्दर्य तथा नमनीयता भर दी। उन्होंने भाषा को संगीतमय बना डाला । बंगला भाषा को टैगोर ने जो सौन्दर्य, रूप और नमनीयता दी है, उसके कारण यह भाषा आधुनिक विश्व की सर्वाधिक सुन्दर और विकसित भाषाओं में गिनी जाती है।

5. गीतांजलि – ‘गीतांजलि’ साहित्यकार रवीन्द्र की एक महान् कृति है। यह वह कृति है जिसने प्रकाशित होते ही अंग्रेजी साहित्य-जगत में तहलका मचा दिया। यह कृति शीघ्र ही बंगला के लिए गीता बन गई। काव्य मर्मज्ञों ने इसे विश्व-साहित्य का एक अनूठा ग्रन्थ कहकर सम्मानित किया । ‘विज्ञान-कला-साहित्य परिषद्’ ने इस कृति को विश्व-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक बतलाकर रवीन्द्र को नोबल पुरस्कार का हकदार घोषित किया। साहित्य-जगत् में इस कृति के द्वारा रवीन्द्र अमर हो गये। रवीन्द्र द्वारा विरचित यह साहित्यिक ग्रन्थ 1909 ई. में प्रकाशित हुआ। प्रारम्भ में यह बंगला भाषा में था। यह ग्रन्थ सुन्दर, उल्लासवर्धक और अमर कविताओं का एक संग्रह है। इस ग्रन्थ में संग्रहित अनेक कविताएँ भावात्मक वर्णन से ओत-प्रोत हैं। इस ग्रन्थ के लिए कलकत्ता के टाउन हाल में उनका हार्दिक अभिवादन किया गया। फिर उन्होंने स्वयं ही इस ग्रन्थ का अंग्रेजी में अनुवाद किया और इंग्लैण्ड की यात्रा की। प्रसिद्ध साहित्यकार डब्ल्यू. वी. यीट्स ने इसकी भूमिका लिखी। यूरोप और अमेरिका में इस ग्रन्थ ने विद्वानों और आलोचकों से प्रशंसा प्राप्त की। यीट्स ने लिखा है- “इन कविताओं के विचारों से मैंने वह संसार पाया जिसका स्वप्न मैं जन्मभर देखता रहा यह महानतम सांस्कृतिक ग्रन्थ है।” इसी ग्रन्थ पर 1913 में टैगोर को नोबल पुरस्कार मिला ।

टैगोर के विचार / रवीन्द्रनाथ टैगोर का सामाजिक योगदान

1. आध्यात्मिकता-टैगोर का आध्यात्मिक मूल्यों की श्रेष्ठता में अटूट विश्वास था । उनकी मान्यता थी कि मनुष्य का ध्येय धन व सत्ता नहीं, अपितु आध्यात्मिक गौरव व कष्ट सहन करने की क्षमता है। उनके मतानुसार श्रेष्ठ जीवन एवं सामाजिक व्यवस्था के लिए आध्यात्मिक साधना अत्यन्त आवश्यक है। आत्मा ही सत्य है तथा वह शरीर, मन और बुद्धि से पृथक् है । धर्म का सच्चा लक्ष्य इस आत्मा की ‘सत्यं, शिवं और सुन्दरं’ से एकता स्थापित करना ही है। टैगोर के अनुसार वैज्ञानिक तथा औद्योगिक विकास ने आध्यात्मिक मूल्यों की उपेक्षा की है जिसके परिणामस्वरूप संघर्ष, अशांति व अराजकता का वातावरण फैला हुआ है।

2. जगत और जीवन में आस्था-आध्यात्म के साथ-साथ टैगोर जीवन के यथार्थ को स्वीकार करते थे। वे जीवन और जगत् की उपेक्षा नहीं करते। उनके अनुसार जीवन और जगत् से पलायनवाद की प्रवृत्ति अनुचित है। टैगोर के अनुसार जगत को मिथ्या मानना और जीवन को बुरा समझना अनुचित है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह करुणा, प्रेम, मैत्री आदि गुणों को अपनाकर जीवन को उदार व श्रेष्ठ बनाए

3. मनुष्य की वन्दना-रवीन्द्रनाथ ने अपनी रचनाओं से मनुष्य को गौरवपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में देवता के माध्यम से मनुष्य को नहीं देखा, वरन् मनुष्य के माध्यम से देवता को देखा है। उनके अनुसार मनुष्य ही पृथ्वी का श्रृंगार, विश्व का सार और सत्य ही महत्तम् अभिव्यक्ति है। वे किसान-मजदूर रूपी नर-देवता की आराधना के पोषक थे रवीन्द्रनाथ के अनुसार किसान व मजदूर ही वास्तव में आराधना के पात्र हैं। देश की सम्पन्नता की आधारशिला वे उन्हीं को मानते हैं।.

4. पूर्व तथा पश्चिम के बीच समन्वय-रवीन्द्रनाथ ने भारतीय तथा पाश्चात्य साहित्य के बीच समन्वय किया है। उन्होंने पूर्व की भाव-परायणता का पश्चिम की रूप-व्याकुलता के साथ समन्वय कर एक नये युग की सृष्टि की है। उनकी रचनाओं में भारतीय आध्यात्मवाद तथा पाश्चात्य भोगवाद के बीच समन्वय दिखाई देता है। वे भारतीय आध्यात्मवाद और पाश्चात्य आधुनिकता तथा स्वतन्त्रता एवं प्रगति के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहते थे । उन्होंने अपनी रचनाओं में प्राचीन भारतीय ज्ञान तथा आधुनिक प्रगतिवादी विचारों का सुन्दर समन्वय किया है ।

5. राष्ट्रीयता को प्रोत्साहन – टैगोर भारत के अनन्य देशभक्त थे। उनमें राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी हुई थी। उनका जीवन देश-प्रेम का ज्वलन्त उदाहरण था। समय-समय पर उन्होंने अंग्रेजी सरकार की नीतियों की कटु आलोचना की। उनका प्रसिद्ध गीत ‘जन-गण-मन’ भारत का राष्ट्रीय गीत बन गया। सन् 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के विरोध में उन्होंने अपनी ‘नाइट’ की उपाधि त्याग दी ।

6. समाज सुधार – रवीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय समाज को प्रगतिशील बनाने पर बल देते थे। वे जाति-प्रथा, ऊँच-नीच तथा अस्पृश्यता को निरर्थक समझते थे तथा सामाजिक समानता के पोषक थे। वे दीन-दुखियों तथा पददलितों से सहानुभूति रखते थे तथा उनकी दशा सुधारने पर बल देते थे। वे नारियों के उत्थान पर भी जोर देते थे। उनके मतानुसार जब तक नारी केवल वासनापूर्ति का साधनमात्र समझी जाती है, तब तक समाज का उत्थान नहीं हो सकता। वे तत्कालीन दूषित शिक्षा प्रणाली में भी परिवर्तन लाना चाहते थे। अपनी शिक्षा सम्बन्धी धारणा को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने 1909 ई. में शान्ति निकेतन में एक स्कूल की स्थापना की ।

7. भारतीय सभ्यता व संस्कृति में अटूट आस्था-रवीन्द्रनाथ भारतीय सभ्यता व संस्कृति के परम भक्त थे । उन्होंने भारत के महान् आदर्शों में पूर्ण आस्था प्रकट की और बताया कि विश्व की समस्त सांस्कृतियों में भारतीय संस्कृति का कलेवर सर्वाधिक उदार व विशाल है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर का मूल्यांकन

इस प्रकार रवीन्द्रनाथ टैगोर की गणना उन महान साहित्यकारों में की जाती है, जिन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं द्वारा भारतवासियों में राष्ट्रीय जागरण की भावना का नवमन्त्र फूंका। उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के गौरव में अभिवृद्धि की और विश्व में भारत का मस्तक ऊँचा किया।

उन्होंने समाज को स्वतन्त्रता, समानता, प्रेम एवं सामंजस्य का पाठ पढ़ाया। महात्मा गाँधी ने लिखा है कि “गुरुदेव की देह खाक में मिल चुकी है परन्तु उनके अन्दर जो ज्योति थी, जो प्रकाश था, वह तो सूर्य के समान था जो तब तक बना रहेगा, जब तक पृथ्वी पर जीवधारी रहेंगे। वे समूचे विश्व के महान् व्यक्तित्व थे ।” डॉ. रामगोपाल शर्मा का कथन है- “रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत की उन महान् विभूतियों में से हैं जिन्होंने देश के साहित्यिक तथा सांस्कृतिक जागरण में महान् योग दिया। कवि टैगोर का साहित्य देश व काल की सीमाओं से आबद्ध नहीं है वह सार्वदेशिक तथा सनातन है। कवि ने साहित्य रचकर जीवन के माधुर्य तथा सभ्यता के गौरव को बढ़ाया है।”

राष्ट्रीय गान के रचियता कौन है?

रबीन्द्रनाथ टैगोर

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