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पर्यावरण पर विकास के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए, विकास पर्यावरण को किस प्रकार प्रभावित करता है?

मानव ने प्रकृति की गोद में जन्म लिया है और वहीं पला तथा बड़ा हुआ है। प्रकृति ही सृष्टि की जननी है। प्रकृति एक स्थिर एवं स्थायी पारिस्थितिक तन्त्र है जबकि मानव का जीवन चक्र अस्थिर एवं गतिमान होता है। मानव अपने जीवन की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रकृति पर निर्भर करता है। मानव का दानक आवश्यकताए दिनदिन बढ़ता जा रहा ह और उसका आर्थिक विकास भी तेजी से हो रहा है।

विगत कुछ दशकों में मानव के आर्थिक विकास में तेजी से वृद्धि होने के फलस्वरूप वह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी तेजी से करने लगा है जिसके फलस्वरूप प्रकृति अपना सन्तुलन बनाये रखने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रही है। प्रकृति में असन्तुलन का प्रत्यक्ष प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। प्रकृति में असन्तुलन का तात्पर्य है—पर्यावरण में असन्तुलन अर्थात् पर्यावरणीय गुणों में ह्रास होना। मानव के आर्थिक विकास के फलस्वरूप निम्नलिखित पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं-

1. वन विनाश का पर्यावरण पर प्रभाव

आर्थिक विकास के लिए मानव को विस्तृत भूमि की आवश्यकता होती है। भूमि प्राप्त करने के लिए वनों को काटना आवश्यक हो जाता है । भारत में वनों के विनाश का क्रम मानवीय क्रिया-कलापों के विस्तार से शुरू हुआ है। बढ़ती जनसंख्या की आवास, उद्योग, परिवहन आदि की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वनों को साफ किया जाने लगा है। वन विनाश का सबसे अधिक दुष्परिणाम पर्यावरणीय व पारिस्थितिकी असन्तुलन है। वनों के नष्ट होने से उनमें स्थित प्राणियों के निवास स्थल भी नष्ट हो गये। अतः भारत की जैव विविधता पर संकट आ गया।

वनस्पति व प्राणियों की अनेक प्रजातियाँ लुप्त हो गईं और अनेक लुप्त होने के कगार पर हैं। वनों के विनाश से वायुमण्डल में ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसों की मात्रा में लगातार वृद्धि, भूक्षरण, हिमस्खलन, अनावृष्टि, बाढ़, वन्य प्राणियों का ह्रास व मरुस्थलीकरण आदि पर्यावरणीय समस्याओं में वृद्धि होगी ।

2. उत्खनन का पर्यावरण पर प्रभाव

आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के लिए औद्योगीकरण आवश्यक है और उद्योगों की स्थापना के लिए खनिज पदार्थों का उत्खनन अत्यावश्यक है। विश्व के विभिन्न देशों में खनन संसाधनों को प्राप्त करने के लिए उत्खनन किया जाता है। जब उत्खनन सघन वनक्षेत्रों में संचालित होता है तो अमूल्य वन सम्पदा नष्ट हो जाती है। उत्खनन के दौरान वायु प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण अत्यधिक होता है । उत्खनन के उपरान्त बेकार छोड़े गये गर्त अन्य किसी उपयोग में नहीं आते हैं।

खानों की खुदाई से निकले मलबे के ढेर जहाँ डालते हैं उसके नीचे की भूमि बेकार हो जाती है। शिवालिक क्षेत्र में चूना-पत्थरों की खदानों से पर्यावरण की अपार क्षति हुई है। धनबाद, हजारी बाग के कोयला- में पर्यावरण का भारी ह्रास हुआ है। क्षेत्रों में अवशिष्ट खनिज के जलस्रोतों में प्रवाह से विस्तृत भूमि बेकार हो गई है। इससे इन क्षेत्रों

3. आधुनिक कृषि के प्रभाव

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त से ही कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कृषि के अन्तर्गत रासायनिक उर्वरकों, मशीनों एवं औजारों, अधिक पैदावार देने वाली किस्मों और वनस्पति के रक्षण रसायनों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाने लगा है। इन खरीदे जा सकने वाले निवेशों ने कृषि को पूँजी गहन और ऊर्जा गहन तथा बाजारोन्मुखी बना दया। इन निवेशों के उपयोग से यद्यपि प्रारम्भ में पैदावार बढ़ी लेकिन एक समय के बाद पवरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुई- त्पादन घटना शुरू हो गया। साथ ही इन निवेशों के अत्यधिक उपयोग से निम्नलिखित

(i) उर्वरक-सम्पूर्ण विश्व में कृषिगत उत्पादकता बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक सायनिक उर्वरक काम में लाए जा रहे हैं। सन् 2003 में विश्वभर में कृषिभूमि के प्रति हैक्टेयर भाग पर औसतन 100 किलोग्राम रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया गया। हमारे देश में रासायनिक उर्वरकों की यह मात्रा 23 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर है । असायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी में सूक्ष्म पोषकों की कमी हो जाती है । उदाहरण के लिए, पंजाब और हरियाणा के अधिक पैदावार वाले क्षेत्रों के बड़े भू-भाग में जस्ता और लोहा की कमी से भूमि की उत्पादकता कम हो गई है।

रासायनिक उर्वरकों के जिस अंश को फसल काम में नहीं लाती है वह । निक्षालित हुई मात्रा भूमिगत जलस्रोतों को प्रदूषित कर निक्षालित होकर नीचे चला जाता देती है। इसी प्रकार वर्षा का जल अपने साथ पोषकों की भारी मात्रा को बढ़ाकर जलस्रोतों में ले जाता है जिससे नदियों, तालाबों और झीलों में कुपोषण हो जाता है।

(ii) वनस्पति रक्षण रसायन-फसलों को कीटों, खरपतवारों, कवकों और चूहों आदि के हमले से बचाने के लिए सामान्यतः कीटनाशी, शाकनाशी, कवकनाशी और कृन्तकनाशी जैसे विषैले रसायनों को काम में लाकर इनको मार दिया जाता है। ये रसायन सामूहिक रूप से जैवनाशी कहलाते हैं। ये जैवनाशी रसायन पीड़कों, खरपतवारों, कवकों या कृन्तकों को नष्ट करने के उपरान्त भी काफी समय तक सक्रिय बने रहते हैं। इनका यही गुण पर्यावरणीय व्यवस्था के लिए खतरनाक सिद्ध हुआ है। वर्तमान समय में विभिन्न प्रकार के विषैले कृषि रसायन भारी मात्रा में काम में लिये जा रहे हैं।

सन् 2002 में संयुक्त राज्य अमेरिका में 3 किलोग्राम, ताइवान में 15 किलोग्राम, जापान में 12 किलोग्राम तथा भारत में 0.75 किलोग्राम जैवनाशी रसायनों का उपयोग प्रति हैक्टेयर भूमि पर किया गया। भारत में उपयोग में लिए जाने वाले जैवनाशी रसायनों में 70 प्रतिशत कीटनाशी, 12 प्रतिशत शाकनाशी, 9 प्रतिशत कवकनाशी और 10 प्रतिशत कृन्तकनाशी रसायनों का हिस्सा होता है। इनके बढ़ते उपयोग की परम्परा ने कृषि उपज को भारी नुकसान पहुँचाया है।

रोग से नष्ट होने वाली कृषि का क्षेत्रफल जैवनाशी रसायनों के उपयोग के बाद भी विश्वभर में दो गुना हो गया है। ये रसायन कीटाणुओं के साथ उनको खाने वाले कीटों का भी नाश कर देते हैं फिर नवीन किस्म के कीटाणुओं का आक्रमण होता है जिनको पहले नष्ट हो जाने वाले कीड़े खा जाया करते थे। इस दौड़ में खाद्यान्नों, दलहनों, तिलहनों, सब्जियों, फलों और दूध आदि में कैन्सर उत्पन्न करने योग्य कीटनाशी रसायन जज्ब हो जाते हैं। इससे विश्वभर में पेट, गले और रक्त के कैंसर रोगियों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। जैवनाशी रसायनों के इस अत्यधिक उपयोग ने खाद्य श्रृंखला के साथ-साथ सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को विषैला बना दिया है।

(iii) जलमग्नता—किसानों ने अपने खेतों में अधिक पानी देने के उत्साह में न केवल नहर से सिंचाई करने के साधन को काम में लिया अपितु कुओं एवं नलकूपों के माध्यम से भूमिगत जल का भी अति दोहन किया है। खेतों में जल निकासी के उचित प्रबन्धन के अभाव में भूमिगत जल स्तर के उत्तरोत्तर बढ़ने से मिट्टियाँ जलमग्नता की समस्या से ग्रस्त हो गई हैं। इस प्रकार की जलमग्न मिट्टियों में वायु की कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा पैदावार कम हो जाती है।

मक्का, बाजरा, कपास, चना, जौ जैसी फसलें जलमग्नता को सहन नहीं कर सकती हैं। विश्व में भारत के पास सबसे अधिक सिंचित क्षेत्रफल है। भारत के 17 राज्यों में लगभग 125 लाख हैक्टेयर भूमि जलमग्नता की समस्या से ग्रसित है। राजस्थान में इन्दिरा गाँधी नहर द्वारा सिंचित क्षेत्र में जलमग्नता की समस्या से प्रथम चरण की अधिकांश भूमि बंजर हो गई है। स्पष्ट है कि जलमग्नता की समस्या से कृषि पैदावार में कमी होने के साथ-साथ कृषियोग्य भूमि में भी कमी होती जा रही है।

(iv) लवणता अत्यधिक सिंचाई के कारण – मिट्टियों में लवण की अधिक मात्रा ऊपरी सतह पर जमा हो जाती है जिसे मिट्टी का लवणीकरण कहते हैं। अधिक मात्रा में सिंचित मिट्टियों में से पानी तो वाष्पित होकर उड़ जाता है और नमक या अन्य लवण मिट्टी की ऊपरी सतह पर ही जमा होते रहते हैं। लवण. प्रभावित मिट्टियाँ क्षारीय अथवा लवणीय हो सकती हैं। क्षारीय मिट्टियों में सोडियम कार्बोनेट और सोडियम बाइकार्बोनेट अधिक होता है जबकि लवणीय मिट्टियों में घुलनशील सोडियम क्लोराइड और सोडियम सल्फेट लवण अधिक होते हैं।

जब मिट्टी में लवणों की मात्रा अधिक हो जाती है तो मिट्टी का घोल पौधों के लिए विषाक्त हो जाता है। लवण प्रभावित मिट्टियों में पौधे पोषक तत्त्वों को अवशोषित नहीं कर पाते हैं और उनको भरपूर मृदा नमी के बीच भी पानी की कृत्रिम कमी का सामना करना पड़ता है। भारत में कुल कृषि योग्य भूमि का लगभग आधा भाग लवणता की समस्या से ग्रस्त है। इसके फलस्वरूप देश को प्रतिवर्ष लगभग 75 लाख टन कृषि उपज की हानि होती है। जलमग्नता और लवणता की समस्या से मरुस्थलीकरण को बढ़ावा मिल रहा है।

4. औद्योगीकरण का पर्यावरण पर प्रभाव

विश्व के विकसित देश औद्योगिक देश हैं अर्थात् उनके आर्थिक विकास का आधार औद्योगीकरण है। आर्थिक प्रगति के लिए औद्योगिक विस्तार एवं औद्योगीकरण आवश्यक है लेकिन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के लिए विस्तृत भूखण्ड की प्राप्ति के लिए पहले वन विनाश करना पड़ता है। उत्पादन इकाइयों से वांछित उत्पादन के अतिरिक्त हानिकारक अवशिष्ट पदार्थ, प्रदूषित जल, जहरीली गैस, रासायनिक अवशेष, धूल, राख, धुआँ आदि भी निकलते हैं। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषक जल, वायु, मिट्टी में मिलकर मिट्टी को प्रदूषित करते हैं और पर्यावरण को भी बिगाड़ देते हैं।

5. नगरीकरण का पर्यावरण पर प्रभाव

नगर आर्थिक विकास के प्रतीक माने जाते हैं। नगरों में जनसंख्या का अत्यधिक जमाव होता है जो पर्यावरणीय समस्याओं को उत्पन्न करता है। महानगरों में तीव्रगति से बढ़ती जनसंख्या के लिए नगर प्रशासन पर्याप्त नागरिक सुविधाएँ जुटाने में असमर्थ हैं। आवास की समस्या, परिवहन की समस्या, पेयजल आपूर्ति की समस्या व प्रदूषण की समस्या से सभी नगर व महानगर प्रसित हैं। पर्याप्त आवासीय सुविधा के अभाव में मलिन बस्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है जहाँ का पर्यावरण किसी भी दृष्टि से मानव के निवास के अनुकूल नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर अत्यधिक भीड़भाड़ से दमघोंटू वातावरण रहता है।

वाहनों की अधिक संख्या के कारण वायु प्रदूषण व शोर प्रदूषण का स्तर मानव की सहन शक्ति के बाहर है। महानगरों में प्रतिदिन एकत्रित होने वाले कूड़ा-करकट, मल-मूत्र व ठोस अवशिष्ट का निस्तारण भी बहुत बड़ी समस्या है। सड़ांध मारते कूड़े के ढेर नगरीय पर्यावरण को प्रदूषित करने के साथ ही विभिन्न महामारियों के कारण बनते हैं। आज विश्व के किसी भी देश के लिए आर्थिक विकास के साधनों को बन्द कर देना सम्भव नहीं है क्योंकि आर्थिक विकास से ही देश 5 की प्रगति सम्भव है। लेकिन आवश्यकता है कि औद्योगीकरण, नगरीकरण, विकासात्मक कार्यों त्या बहुउद्देश्यीय नदी परियोजनाओं का क्रियान्वयन पर्यावरणीय दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए किया जाये।