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‘प्रदेश’ शब्द का अर्थ बताते हुए प्रादेशिक भूगोल की अवधारणा की विवेचना कीजिए

प्रादेशिक भूगोल का आशय है-वह भूगोल, जिसका सम्बन्ध प्रदेश से हो। यहाँ प्रदेश (Region) शब्द व्यापक एवं संकुचित दोनों अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। व्यापक अर्थ में यह समस्त विश्व के भिन्न-भिन्न प्रदेशों को समाहित करता है और संकुचित अर्थ में यह किसी एक देश के प्रदेशों की ओर इंगित करता है। भूगोल में प्रमुखतः प्राकृतिक भूगोल तथा मानव भूगोल रूप से ही विभिन्न प्रकार के भूगोलों जैसे-भौतिक भूगोल, आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल, संसाधन भूगोल, संसाधन उपयोग का भूगोल, कृषि भूगोल, नगरीय भूगोल, जलवायु भूगोल, औद्योगिक भूगोल आदि का समाहार किया जाता है-इसी प्रकार भूगोल में प्रादेशिक भूगोल की भी गणना की जाती है। जिस तरह भूगोल के दो प्रमुख घटक मानव व प्रकृति अन्तर्सम्बन्धित हैं उसी प्रकार प्रादेशिक भूगोल में भी प्रदेश विशेष की प्रकृति व मानव में अन्तर्सम्बन्ध स्वीकार कर उनका ही भौगोलिक अध्ययन किया जाता है ।

अंग्रेजी भाषा के शब्द Region का अर्थ हिन्दी में प्रदेश स्वीकार किया जाता है परन्तु भूगोल के बढ़ते प्रसार ने इस शब्द के अर्थ का भी विस्तार किया है और इसका अर्थ ‘क्षेत्र’ भी किया जाने लगा। इस प्रकार Regional Geography को प्रादेशिक भूगोल अथवा क्षेत्रीय भूगोल दोनों ही संज्ञाओं से अभिहित किया जाने लगा और Regional Geography के ये दोनों ही नाम अर्थात् प्रादेशिक भूगोल तथा क्षेत्रीय भूगोल स्वीकार किए जाने लगे।

प्रदेश शब्द का अर्थ (Meaning of Region)

प्रदेश उस क्षेत्र (Area) को कहते हैं, जिसमें किसी विशेष गुण या लक्षण (Feature) का एक-सा-पन अर्थात् उसकी समांगता (Homogeneity) सारे क्षेत्र भर में होती है। विशिष्ट स्थिति (Specific Location) का वह ऐसा क्षेत्र होता है, जो किसी न किसी बात में दूसरे क्षेत्रों से भिन्न होता है और जितनी दूरी तक वह भिन्नता (Distinction) रहती है, उतने ही क्षेत्रफल में उस प्रदेश का विस्तार होता है। इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में उसके विशेष लक्षण की (i) समानता (Similarity of Specific Feature) होती है, तथा (ii) दूसरे प्रकार के प्रदेशों से भिन्नता रहती है। डॉ. शर्मा एवं कौशिक ने अपने ग्रंथ ‘भौगोलिक चिंतन’ (Geographic Thought) में प्रदेश (Region) की यह जो व्याख्या प्रस्तुत की है, उससे स्पष्ट होता है कि प्रदेश में क्षेत्र का समाहार स्वयं की समानता तथा दूसरों से भिन्नता के आधार पर होता है और यहीं तक किसी प्रदेश के क्षेत्रफल का विस्तार होता है। इस तरह Regional Geography के दोनों नाम- (i) प्रादेशिक भूगोल तथा (ii) क्षेत्रीय भूगोल एक ही अर्थ को व्यक्त करते हैं

कम्पेज (Compage)

भूगोल के इस शब्द का उपर्युक्त अर्थ में प्रयोग होता है और कहीं-कहीं कम्पेज शब्द भी उपलब्ध होता है। डॉ. कौशिक एवं शर्मा ने अपने ग्रंथ में कम्पेज को इस तरह परिभाषित किया है — कम्पेज (Compage) – कई छोटे-छोटे उप-प्रदेशों से मिलकर बना हुआ, ऐसा प्रदेश जो बहुत अधिक जटिल (Highly Complex) हो परन्तु उसमें तत्त्व सम्मिश्रण की एकता हो, उसे कम्पेज कहते हैं। प्रत्येक कम्पेज में समस्त भौतिक लक्षणों (Physical Features) के जैव लक्षणों (Biotic Features) के तथा सामाजिक वातावरण के कर्मोपलक्षा सम्बन्ध उस प्रदेश के मानवीय अधिष्ठान (Occupance) होते हैं।” इस प्रकार स्पष्ट होता है कि कम्पेज का विचार यद्यपि प्रदेश (उप-प्रदेश) से सम्बन्धित है, लेकिन उसमें मानवीय अधिष्ठान पर अधिक बल दिया जाता है ।

अन्य भौगोलिक शब्द-प्रदेश (Region) शब्द के लिए जर्मन और सोवियत

भूगोलवेत्ता ‘लैण्ड शाफ्ट’ (Landschaft) शब्द का प्रयोग करते हैं और वे प्रदेश की कम से कम चार भिन्न संकल्पनाएँ करते हैं— (i) लाक्षणिक प्रदेश (Formal Region), (ii) कर्मोपलक्षी प्रदेश (Functional Region), (iii) सामान्य प्रकार के प्रदेश (Genetic Region), तथा (iv) विशिष्ट प्रदेश (Specific Regions) । प्रायः प्रत्येक प्रकार के प्रदेश के लिए लैण्ड शाफ्ट शब्द का प्रयोग किया जाता है और प्रत्येक प्रकार के प्रदेश के अध्ययन में विभिन्न तत्त्वों जैसे भू-रचना, जलवायु, वनस्पति आदि का विश्लेषण और समाकलन किया जाता है।

स्पष्ट है कि पाश्चात्य भूगोलवेत्ताओं ने ‘प्रदेश’ का बड़ी सूक्ष्मता से भौगोलिक अध्ययन प्रस्तुत किया है और उसे विस्तृत रूप दिया है। अमेरिकी विचारधारा में इस प्रकार के प्रदेशों को स्थानिक संगठन (Spatial Organisation) कहते हैं। सोवियत विचारधारा में इस प्रकार के अध्ययन-क्षेत्र को ‘सम्मिश्रण समाकलन प्रदेश’ (Complex Integral Region) कहते हैं।

भौगोलिक अध्ययन के उपागम या रीतियाँ

प्रादेशिक भूगोल, भूगोल के अध्ययन की एक विशिष्ट विधि है क्योंकि भूगोल के अध्ययन में दृश्य घटनाओं के अत्यन्त जटिल समाकलन का विश्लेषण होता है और इसके लिए क्रमबद्ध (Systematic) तथा प्रादेशिक (Regional) दोनों विधियों का प्रयोग आवश्यक होता है। इससे ही भौगोलिक अध्ययन पूर्ण होता है।

1. क्रमबद्ध विधि (Systematic Approach) – इसे ‘प्रकरण बद्ध’ विधि (Topical Method) भी कहते हैं। इस विधि में प्रत्येक क्षेत्र की भू-रचना, जलवायु, मिट्टियों, वनस्पति और आर्थिक व्यवस्था का अलग-अलग प्रकरणों में विश्लेषण किया जाता है जिसकी अर्थात् क्रमबद्ध भूगोल की अन्य शाखाएँ मृदा भूगोल, वनस्पति भूगोल, कृषि भूगोल, जनसंख्या भूगोल, जैव भूगोल, सांस्कृतिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल, नगरीय भूगोल, औद्योगिक भूगोल, परिवहन भूगोल इत्यादि अन्य शाखाएँ होती हैं, परन्तु इन सबमें अर्थात् क्रमबद्ध भूगोल के अन्दर प्रादेशिक भूगोल भी समाविष्ट रहता है।

2. प्रादेशिक विधि (Regional Approach) – यह विधि क्रमबद्ध विधि की पूरक है । इसमें पृथ्वीतल का अलग-अलग प्रदेशों के रूप में अध्ययन होता है। पृथ्वी को मिलती-जुलती विशेषताओं के समांग प्रदेशों में विभक्त करते हैं और प्रत्येक प्रदेश या क्षेत्र (Region) भौगोलिक तत्त्वों का विश्लेषण करते हैं। भूगोल के इस पक्ष को प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) कहते हैं। अतः प्रादेशिक भूगोल में भी क्रमबद्ध भूगोल समाविष्ट रहता है; क्योंकि ये दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।

भौगोलिक प्रदेशों के प्रकार-भूगोल में कई प्रकार से भौगोलिक प्रदेशों की अवधारणा की यष्ट विश्लेषण किया जाता है। जर्मन भूगोलवेत्ताओं ने, जैसा पहले बताया जा चुका है, प्रदेश की कम से कम चार भिन्न संकल्पनाएँ की हैं— (1) लाक्षणिक प्रदेश, (2) कर्मोपलक्षी प्रदेश, (3) सामान्य प्रकार के प्रदेश, तथा (4) विशिष्ट प्रदेश। इसके साथ ही विशेष लक्षणों (Features) या कर्मों (Functions) के आधार पर प्रदेशों के बहुत से भेद किए जाते हैं। जैसे- (i) प्राकृतिक प्रदेश, (ii) जलवायु प्रदेश, (iii) कृषि प्रदेश, (iv) निर्माण प्रदेश, (v) सांस्कृतिक प्रदेश, एवं (vi) मृत्तिका प्रदेश और बड़े नगरों या निर्माण केन्द्रों के क्षेत्रों का संगम प्रदेश (Nodal Region)

प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography)

भौगोलिक अध्ययन के दो (Approaches) है क्रमबद्ध या प्रकरणबद्ध उपागम तथा (ii) प्रादेशिक उपभाग प्रादेशिक उपागम में पृथ्वीतल का अलग-अलग प्रदेशों के रूप में अध्ययन होता है। पृथ्वीक मिलती-जुलती विशेषताओं को समांग (Homogeneous) प्रदेशों में विभक्त करते हैं और प्रत्येक प्रदेश या क्षेत्र में भौगोलिक तत्त्वों का विश्लेषण करते हैं। भूगोल के इस उपागम या पक्ष को ‘प्रादेशिक भूगोल’ कहते हैं।

दूसरे शब्दों में, प्रादेशिक उपागम (Regional Approach) या प्रादेशिक विधि के द्वारा पृथ्वीतल को अलग-अलग प्रदेशों या क्षेत्रों में विभाजित करके प्रत्येक प्रदेश या क्षेत्र के समस्त ‘भौतिक तथ्यों’ और ‘मानवीय तथ्यों’ का विश्लेषण और संश्लेषण किया जाता है। इस तरह पृथ्वी का अलग-अलग प्रदेशों में (Region-by-Region) अध्ययन होता है। भूगोल के इस पक्ष को प्रादेशिक भूगोल कहते हैं।

प्रादेशिक भूगोल की संकल्पना का इतिहास

भूगोल में ‘क्रमबद्ध’ और ‘प्रादेशिक’ उपागम का प्रयोग प्राचीनकाल से ही होता चला आ रहा है। प्राचीन भारत में ईसा से पूर्व, बौद्ध-काल में समस्त पृथ्वी का भौगोलिक अध्ययन कई प्रकरणों के माध्यम से होता था और भारत, मिस्र, ईरान, मध्य एशिया आदि क्षेत्रों का अध्ययन प्रादेशिक उपागम द्वारा होता था तथा रोमन और यूनानी भूगोलवेत्ता क्रमबद्ध तथा प्रादेशिक दोनों ही रीतियों का प्रयोग भौगोलिक अध्ययन के लिए करते थे।

भारत में यह भौगोलिक अध्ययन-सौरमण्डल में एक ग्रह (Planet) के रूप में होता था, जिसमें घूर्णन या अक्ष- भ्रमण, परिक्रमण या कक्ष-भ्रमण, दिन-रात के छोटे-बड़े होने, ऋतु परिवर्तन आदि के प्रकरणों का अध्ययन क्रमबद्ध उपागम द्वारा होता था।

17वीं शताब्दी में 1650 में वारेनियस ने दो भागों में— (i) सामान्य भूगोल तथा (ii) विशेष भूगोल- एक भौगोलिक ग्रन्थ प्रकाशित किया। जिसके ‘सामान्य भूगोल’ भाग में पृथ्वी का एक इकाई के रूप में वर्णन था और इसमें सम्पूर्ण पृथ्वी की दृश्य घटनाओं से संबंधित सामान्य नियमों का प्रतिपादन किया गया था तथा दूसरे भाग विशेष भूगोल में अलग-अलग देशों का वर्णन किया गया था। आशय यह है कि ‘सामान्य ‘भूगोल’ के अन्तर्गत ‘क्रमबद्ध भूगोल’ और ‘विशेष भूगोल’ के अन्तर्गत ‘प्रादेशिक भूगोल’ था; परन्तु वारेनियस का दृष्टिकोण द्वैतवादी नहीं था। सामान्य नियमों को विशेष वर्णनों से प्रयुक्त 20वीं शताब्दी में जर्मनी के रिचथोफन ने भूगोल में ‘क्रमबद्ध पक्ष’ तथा ‘प्रादेशिक पक्ष’ दोनों के किया गया था।

इस प्रकार उसके भूगोल में ‘भूगोल को घनिष्ठ एकता’ की रचना होती में है सम्बन्धों का स्पष्टीकरण किया। 1920 से 1930 तक के वर्षों में हेप्नर ने अपने शोध-पत्रों और प्रन्थों द्वारा इस बात पर बल दिया कि भूगोल में तत्वों के आधार पर किए गए अध्ययन अम (सामान्य) तथा विशेष (प्रादेशिक) दोनों ही समान रूप में आवश्यक और महत्त्वपूर्ण हैं। इसके पश्चात् तो प्रादेशिक भूगोल की संकल्पना का निरन्तर विकास होता गया और आज उसकी अनेक शाखाओं व उप-शाखाओं से वह समृद्ध बनता जा रहा है।

प्रादेशिक अध्ययन-जब क्रमबद्ध रीति से किन्हीं जलवायु, मिट्टी, वनस्पति, परिवहन, निर्माण, कृषि आदि तत्त्वों का प्रकरणबद्ध (Topical) अध्ययन करते हैं तथा पृथ्वी में विभिन्न क्षेत्रों या उन प्रदेशों में उन तत्त्वों का वितरण समझाया जाता है और जब किसी महाद्वीप को या लक्षणों का विश्लेषण किया जाता है।

प्रदेश या में प्रदेश अध्ययन किया जाता है, तब उन इस तरह किसी देश या अययन में सामान्यतः निम्न बातों का ध्यान रखा जाता

  • (i) उसको अक्षांशीय स्थिति, जिससे उसके तापमान, वायुदाब, वायु की दिशा और वर्षा
  • गयों के स्वरूपों से निकटता अथवा दूरी का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • (ii) उसकी भौगोलिक स्थिति विषुवत रेखा से दूरी, समुद्र तल से ऊँचाई, नदियों या
  • (iii) भूतत्व एवं भू-स्वरूप, जिससे वहाँ की चट्टानों, मिट्टियों, सम्बन्धित खनिजों आदि श्री सूचना मिलती है।
  • (iv) क्षेत्र की जलवायु, आर्द्रता, वर्षा एवं उससे सम्बन्धित वनस्पति के स्वरूप, उनका वितरण एवं विदोहन सम्बन्धी ज्ञान ।
  • (v) पशुजीवन
  • (vi) मानव का अध्ययन-उसका क्षेत्रीय वितरण, वितरण का घनत्व, उसकी बस्तियाँ, उसकी सभ्यता का स्तर, सामाजिक संगठन, प्रजातियाँ, उसके मानसिक एवं शारीरिक गुण, धार्मिक रीति रिवाज, पड़ोसियों से उसके सम्बन्ध, परिवहन की सुविधाएँ एवं स्वरूप, व्यापारिक केन्द्र, शिक्षण संस्थाएँ, भोजन, गृह, वेशभूषा आदि ।
  • (vii) मानव द्वारा अपने भौतिक वातावरण में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले परिवर्तन, उद्योग आदि। प्रादेशिक भूगोल में उपर्युक्त सभी तथ्यों का एक प्रदेश से सम्बन्धित व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।

आजकल भूगोल के अध्ययन में तुलनात्मक उपागम (Comparative Approach) द्वारा दो या दो से अधिक भौतिक समानता या असमानता वाले क्षेत्रों को चुनकर मानव द्वारा प्रभावित कारकों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने के उपरान्त उपयुक्त निष्कर्ष निकाले जाते हैं। पर्यावरण व पारिस्थितिक भूगोल में वायु प्रदूषण के क्षेत्रीय प्रभाव, प्रदूषण निवारण के लिए क्षेत्रीय प्रयत्न, शोर प्रदूषण के क्षेत्रीय कारक तथा संसाधनों की उपलब्धि व उपयोग में क्षेत्रीय कारकों का अध्ययन किया जाता है।

वितरण की दृष्टि से संसाधन वर्गीकरण में सर्वसुलभ, सामान्य सुलभ, विरल केन्द्रित संसाधनों पर विचार करते हुए क्षेत्रीय निष्कर्ष निकाले जाते हैं। नोन्मूलन को रोकने के लिए भी राष्ट्रीय योजनाओं के साथ-साथ क्षेत्रीय योजनाओं पर विचार किया जाता है। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम का मूल्यांकन भी क्षेत्रीय आधार पर किया जाता है। वन्य जीव संरक्षण के अन्तर्गत क्षेत्रीय स्तर पर विचार किया जाता है और विभिन्न प्राकृतिक प्रदेशों में विभिन्न जीव जन्तुओं की उपलब्धि का क्षेत्रीय निष्कर्ष निकाला जाता है।

पर्यावरण अवन्धन हेतु उनके विस्तारीय स्वरूप तथा क्षेत्रीय स्वरूप (Regional Dimensions) पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है। आर्थिक विकास व उसका पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का भी क्षेत्रीय स्तर पर अध्ययन किया जाता है तथा क्षेत्रीय संधियाँ व अनुबंध तो आज बड़े चर्चित हो अहैं। इतना ही नहीं, खनिजों का असमान वितरण भी क्षेत्रीयता लिए हुए है तथा खनिजों के इस असमान वितरण का उपयोग कभी राष्ट्रीय आवश्यकताओं के लिए और कभी क्षेत्रीय ● आवश्यकताओं के लिए होता है तो कभी कतिपय क्षेत्रों को निर्यात हेतु ।