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तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का शिक्षा के प्रमुख केन्द्रों के रूप में महत्त्व बताइए

तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का शिक्षा के प्रमुख केन्द्रों के रूप में महत्त्व बताइए

By India Govt News

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भारत में आरम्भ में व्यवस्थित शिक्षण संस्थाओं की स्थापना नहीं हुई थी। वैदिक काल में बालक प्रायः अपने घर पर ही वृद्ध जनों से अथवा पिता से शिक्षा ग्रहण करते थे । महाकाव्य काल में तपोवन आश्रम प्रणाली प्रचलित हुई जिसमें छात्र वनों में स्थित आश्रमों में ऋषि मुनियों के चरणों में बैठकर विविध प्रकार की शिक्षा ग्रहण करते थे।

इसके उपरान्त मौर्य और गुप्त साम्राज्यों के शासन के अन्तर्गत सुगठित शिक्षण संस्थाएँ व्यापारिक नगरों, तीर्थ स्थलों एवं साम्राज्यों की राजधानियों में स्थापित की जाने लगीं। चन्द्रगुप्त, समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन आदि सम्राट स्वयं भी विद्वान थे तथा उनकी राजसभा भी विद्वानों से अलंकृत रहती थी। काशी (वाराणसी) उस काल में शिक्षा का प्रख्यात केन्द्र था ।

क्या है आर्टिकल में

वहाँ के सुसंस्कृत विद्वान प्रायः विवादास्पद विषयों पर निर्णय देते रहते थे जो सभी को मान्य होते थे। उज्जैन ज्योतिष का प्रसिद्ध केन्द्र था तथा वराहमिहिर उस काल के सर्वश्रेष्ठ ज्योतिषी थे। उस काल के कुछ प्रमुख शिक्षा केन्द्र कांची तक्षशिला, मिथिल, कन्नौज, धारानगरी, कल्या-गी आदि थे । कालान्तर में शिक्षण संस्थाएं बौद्ध विहारों में केन्द्रित हो गयीं और वे विकसित होकर विश्वविद्यालयों का रूप धारण करने लगीं। उस काल के कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों का विवरण निम्न प्रकार है-

तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का शिक्षा के प्रमुख केन्द्रों के रूप में महत्त्व बताइए

तक्षशिला विश्वविद्यालय

इस विश्वविद्यालय को भारत की प्राचीनतम शिक्षण संस्था होने का गौरव प्राप्त है। यह आधुनिक पाकिस्तान में रावलपिण्डी से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। इतिहासकारों के अनुमान के अनुसार इसकी स्थापना रामचन्द्र जी के भ्राता भरत के पुत्र तक्ष द्वारा की गयी थी। इसी कारण से इसे तक्षशिला कहा गया। बौद्ध -ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार इस विश्वविद्यालय में अनेक विषयों में दक्ष विद्वान् रहते थे जो स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विषय के अध्यापन कार्य में व्यस्त रहते थे।

ये सभी प्रकाण्ड पण्डित अवैतनिक रूप से कार्य करते थे । गुरु दक्षिणा का आधार छात्र की आर्थिक स्थिति पर निर्भर था जो एक सहस्त्र कर्षापण (चांदी का सिक्का 58 ग्रेन तोल का) से अधिक नहीं होता था । निर्धन छात्रों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। ये छात्र अध्ययन के साथ-साथ अपने आचार्य की सेवा भी करते थे। यहाँ धनी तथा निर्धन छात्रों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता था। आचार्य ही छात्रों के संरक्षक होते थे तथा वे अपने छात्रों की चहुँमुखी उन्नति के लिये प्रयत्नशील रहते थे। यहां निश्चित पाठ्यक्रम तथा शिक्षा-सत्र नहीं होते थे।

यहाँ आचार्य के सन्तुष्ट होने पर ही छात्र की शिक्षा पूर्ण मान ली जाती थी। शिक्षा पूर्ण करने पर छात्रों को उपाधि देने की प्रथा का भी इस विश्वविद्यालय में अभाव था। यहाँ छात्रों को लगभग 16 वर्ष की अवस्था में भर्ती किया जाता था तथा लगभग आठ-नौ वर्ष की अवधि में उनकी शिक्षा पूर्ण हो जाती थी। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त ने भी अपनी युवावस्था में यहाँ शिक्षा प्राप्त की थी। अष्टाध्यायी के रचियता पाणिनी, अर्थशास्त्र के निर्माता आचार्य विष्णुगुप्त, चाणक्य (कौटिल्य) तथा उच्च कोटि के शल्य चिकित्सक कुमारगुप्त भी इसी विश्वविद्यालय के स्नातक थे ।

जातक कथाओं के अनुसार बोधिसत्व (महात्मा बुद्ध) ने भी अपने पूर्व जन्म में यहाँ शिक्षा प्राप्त की थी। कौशल नरेश प्रसेनजित, वैशाली के महालि, कुशीनगर के मल्ल, वसुबन्धु तथा ख्याति प्राप्त वैद्य जीवक आदि सुयोग्य व्यक्ति इसी विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करके स्नातक बने थे । इस विश्वविद्यालय की ख्याति सम्पूर्ण एशिया महाद्वीप में थी तथा सुदूर देशों के राजकुमार यहाँ राजनीति एवं युद्ध कला की शिक्षा प्राप्त करने के लिये आते थे ।

यहाँ अट्ठारह प्रकार की शिल्प, व्याकरण, आयुर्वेद, राजनीति, अर्थशास्त्र तथा वेद-वेदांग की शिक्षा प्रदान की जाती थी। प्रायः सूर्योदय से पूर्व ही अध्यापन कार्य आरम्भ हो जाता था जो दोपहर तक चलता रहता था। संध्या के समय छात्रगण अपने पाठ की पुनरावृत्ति करते थे। भारत के प्रवेश द्वार के समीप स्थित होने के कारण आक्रमणकारियों द्वारा इसे ध्वस्त कर दिया गया था। पाकिस्तान में आज भी इसके खण्डहर रावलपिण्डी के निकट विद्यमान हैं।

(2) नालन्दा विश्वविद्यालय-यह विश्वविद्यालय बिहार में आधुनिक बड़ा गांव के पास स्थित था। इसे प्राचीन भारत के सर्वाधिक महान् और उच्च कोटि का विश्वविद्यालय होने का श्रेय प्राप्त था । इसका प्राचीन नाम ‘नाल’ था जिससे यह धीरे-धीरे नालन्दा कहा सम्राट अशोक को इसका संस्थापक माना जाता है। अधिकांश विद्वानों के मतानुसार इसका उत्कर्ष चीनी यात्री फाह्यान के समय में हुआ था जो सन् 405 ई. में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के आठ विशाल हाल (बड़े कमरे) तथा 300 कमरे थे। कमरे सम्भवतया छात्रों के रहने के लिए शासन के अन्तर्गत भारत आया था।

चीनी यात्री इत्सिंग के कथनानुसार इस विश्वविद्यालय में आठ विशाल हॉल तथा 300 कमरें थे जिनमे संभवतया छात्रों के रहने के लिए निर्मित कराये गये होंगे। चीनी यात्री ह्वेनसांग के कथनानुसार इस विश्वविद्यालय में दस सहस्त्रविद्यार्थीमहायान तथा बौद्धमत की अन्य 18 शाखाओं, वेदों तथा जादू टोनों आदि का अध्ययन करते थे। पद्मिनी सेन गुप्ता ने नालन्दा की प्रशंसा करते हुए व्यक्त किया है—“शिक्षा के उत्कर्ष. के लिये बौद्धमत की देन यह थी कि उसके प्रसिद्ध विहार रूपी विश्वविद्यालय सभी के लिए समान रूप से खुले थे केवल द्विजों और बौद्धों के लिए नहीं। नालन्दा को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का विश्वविद्यालय माना जा सकता है, क्योंकि चीन तक के छात्र बौद्ध मत की शिक्षा ग्रहण करने बौद्ध धर्म के संस्थापक के देश अर्थात् यहाँ आते थे।

नालन्दा का उल्लेख हमें ईस्वी पूर्व चतुर्थ और पंचम शताब्दियों के साहित्य में मिलता है, परन्तु इसकी महानता के विषय में गुप्त काल से पूर्व के समय की अधिक पुष्टि नहीं होती है। यह विश्वविद्यालय पटना के समीप स्थित बिहार शरीफ के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। यहाँ महायान और हीनयान सम्प्रदायों के एक-एक मठ बने हुए थे।

“गुप्त वंश के शासकों, सम्राट हर्षवर्धन तथा बंगाल के पालवंशीय नरेशों द्वारा विश्वविद्यालय के व्यय की पूर्ति के लिये लगभग सौ ग्राम दिये गये थे जहां के कृषक नियमित रूप से चावल, घृत, दुग्ध आदि भारी मात्रा में नालन्दा विश्वविद्यालय को प्रतिदिन अर्पित करते थे।

बौद्ध ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि सुवर्ण द्वीप (आधुनिक सुमात्रा) के शासक द्वारा भी विश्वविद्यालय को भारी आर्थिक सहायता दी गयी थी। ह्वेनसांग, तांगताओ, हुई ली आदि अनेक विद्वानों ने इस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की थी। यहां के पद्मसम्भव आदि विद्वान तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार करने गये थे। संक्षेप में कहा जा सकता है कि नालन्दा विश्वविद्यालय हर्षकालीन भारत का गौरवान्वित विश्वविद्यालय था ।

(3) वल्लभी विश्वविद्यालय-इस विश्वविद्यालय की स्थापना सातवीं शताब्दी में सौराष्ट्र के मैत्रक शासकों द्वारा काठियावाड़ में की गयी थी। इसे उस काल का बौद्ध शिक्षा का प्रधान केन्द्र माना गया है। यहाँ पर भी नालन्दा विश्वविद्यालय जैसी उच्च शिक्षा की व्यवस्था थी जिसके कारण इसकी ख्याति दूर-दूर तक हो गयी थी तथा देश-विदेश के छात्र यहाँ विद्याध्ययन के उद्देश्य से आते थे ।

यहाँ के आचार्य अपनी विद्वता के लिये प्रसिद्ध थे। इसके अतिरिक्त यहाँ के पुस्तकालय में अत्यन्त अमूल्य ग्रन्थों का संग्रह था। इस विश्वविद्यालय की ख्याति इतनी अधिक हो गई थी कि अनेक बड़े-बड़े विद्वान भी अपनी जटिल समस्याओं की गुत्थियाँ सुलझाने तथा अपनी शंकाओं के समाधान के लिये यहाँ आते रहते थे ।

(4) विक्रमशिला विश्वविद्यालय-इस विश्वविद्यालय की स्थापना बंगाल के पालवंशीय शासक धर्मपाल द्वारा भागलपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर पत्थरघाट नामक स्थान पर की गयी थी। लगभग चार शताब्दियों तक इसे भारत के प्रमुख विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता प्राप्त होती रही थी।

नालन्दा विश्वविद्यालय के विनाश ने इसे प्रसिद्धि प्रदान की तथा यह भारत का सुसंगठित और व्यवस्थित विश्वविद्यालय माना जाने लगा। छः विद्यालय इससे सम्बन्धित थे तथा लगभग तीन सहस्त्र विद्यार्थी यहाँ विभिन्न विषयों का अध्ययन करते थे। यहाँ. की परीक्षाओं, अनुशासन एवं शिक्षा आदि की देखभाल के लिये छ: उच्च कोटि के विद्वानों की एक समिति बनी हुई थी। विश्वविद्यालय के चारों ओर एक सुदृढ़ दीवार बनी हुई थी, जिसमें चार द्वार थे।

प्रत्येक द्वार पर एक द्वार पण्डित होता था जो विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के इच्छुक छात्रों की परीक्षा लेता था। परीक्षा में उत्तीर्ण विद्यार्थी ही विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने के अधिकारी माने जाते थे। इस विश्वविद्यालय का तिब्बत के साथ विशिष्ट सम्बन्ध था तथा तिब्बती छात्रों के ठहरने के लिये विश्वविद्यालय के समीप ही एक धर्मशाला भी बनी हुई थी।

यहाँ के अनेक विद्वान थे जिन्हे जनता धर्म गुरु के नाम से सम्बोधित करती थी। इन विद्वानों ने संस्कृत के अनेक अमूल्य ग्रन्थों यहाँ के अनेक विद्वान बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिये तिब्बत गये जिन्हें वहाँ की तिब्बती का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया। इन विद्वानों के प्रयासों के परिणामस्वरूप अल्पकाल में ही समस्त तिब्बती जनता बौद्ध धर्म का पालन करने लगी तथा तिब्बत के शासक दलाई लामा ने भी बौद्ध मत का अनुकरण करना आरम्भ कर दिया।

विषयों के अतिरिक्त तन्त्र शास्त्र की शिक्षा की भी व्यवस्था थी। विद्याध्ययन पूर्ण करने वाले इस विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म के साथ-साथ दर्शन, व्याकरण, न्याय, ज्योतिष आदि विद्यार्थियों के लिये प्रति वर्ष दीक्षान्त समारोह आयोजित किया जाता था जिसमें पालवंश के शासक के हाथों स्नातकों को उपाधि प्रदान कराई जाती थी। तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में तुर्क आक्रमणकारियों द्वारा इस विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया गया।

(5) जागछल विश्वविद्यालय-इस विश्वविद्यालय की स्थापना बंगाल के राजा रामपालसिंह द्वारा 12वीं शताब्दी के आरम्भ में की गयी थी। बंगलादेश के राजाशाही जिले के जागछल नामक स्थान पर इसकी स्थापना की गयी थी। इस विश्वविद्यालय में तन्त्र विद्या व बौद्धमत की हीनयान शाखा के सिद्धान्तों की शिक्षा दी जाती थी । भिक्षु सुधाकर गुप्त, विभूतिचन्द्र और दानशील यहाँ के ख्याति प्राप्त तान्त्रिक थे। पूरी एक शताब्दी तक कार्य करते’ रहने के उपरान्त इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था।

(6) वाराणसी – यह नगर ही काशी अथवा आधुनिक बनारस के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ कोई सुगठित विश्वविद्यालय तो नहीं था परन्तु प्राचीनकाल से ही यह नगर संस्कृत विद्या का केन्द्र रहा है। यहाँ वेद, वेदांग और हिन्दू धर्मशास्त्रों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था रही है। इसी कारण से यहाँ के विद्वान् संस्कृत ज्ञान के प्रकाण्ड पण्डित रहे हैं।

तक्षशिला विश्वविद्यालय के पतन से इसके महत्त्व में वृद्धि हो गयी थी। शंकराचार्य जी का यहीं के प्रकाण्ड विद्वान मण्डन मिश्र के साथ शास्त्रार्थ हुआ था। कहा जाता है कि मण्डन मिश्र के द्वार पर टंगा तोते का जोड़ा भी शास्त्रार्थ करता रहता था। धर्म सम्बन्धी जटिल समस्याओं के समाधान में यहाँ के विद्वान पण्डित अत्यधिक कुशल थे तथा उनके निर्णय सभी को मान्य होते थे ।

(7) काश्मीर- अलबरुनी एवं अन्य इतिहासकारों के आधार पर वाराणसी की भांति तत्कालीन काश्मीर में भी कोई व्यवस्थित विश्वविद्यालय नहीं था, परन्तु यहाँ के विभिन्न विषयों में दक्ष विद्वान पण्डित अपने निवास स्थान पर ही शिक्षा दान करते थे। दूर-दूर से शिक्षार्थी आकर उनसे वेदान्त, ज्योतिष, साहित्य आदि विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करते थे ।

(8) ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय-इस विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के शासक गोपाल द्वारा की गई थी। लगभग आठवीं शताब्दी के अन्तर्गत इसका निर्माण पाटलिपुत्र के समीप कराया गया था। इस विश्वविद्यालय में तन्त्र ज्ञान पर विशेष बल देते हुए छात्रों को तांत्रिक साहित्य से परिचित कराया जाता था। यही इसकी प्रमुख विशेषता थी तथा सहस्त्रों की संख्या में छात्र यहाँ तन्त्र विद्या की शिक्षा प्राप्त करते थे। मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा इसे भी तेरहवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में नष्ट कर दिया गया था।

(9) ताम्रलिप्ति विश्वविद्यालय-इस विश्वविद्यालय का निर्माण बंगाल के मिदनापुर जिले में कराया गया था। यहाँ दूर-दूर से आये छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे । मौर्य काल में भारत आये चीनी यात्री फाह्यान ने भी इस विश्वविद्यालय में बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन किया था। उस काल में यहाँ लगभग दो सहस्त्र बौद्ध भिक्षु धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन में व्यस्त रहते थे।

सम्राट हर्षवर्धन के समय में आये चीन यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में इस विश्वविद्यालय काउल्लेख करते हुए यहाँ दस विहारों एवं एक सहस्त्र भिक्षुओं द्वारा बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन करना ट किया था। चीनी यात्री इत्सिंग ने भी यहाँ पर्याप्त लम्बी अवधि तक निवास किया था तथा अपने यात्रा वृत्तान्त में इस विश्वविद्यालय का विशद् विवरण प्रस्तुत किया था।

(10) दक्षिण भारत के मन्दिर-ये मन्दिर स्वयं ही शिक्षण संस्थाएँ बने हुए थे । आगम-साहित्य, भक्ति सम्प्रदाय तथा मन्दिर उपासना ने स्वाभाविक रूप से दक्षिणी भारत में मन्दिर निर्माण कला को विकसित किया, जिसके आधार पर वहाँ के शिव तथा विष्णु के मन्दिर अपनी भव्यता, दिव्यता, विस्तार और रमणीयता में भक्ति सम्प्रदाय के भक्तों की श्रद्धा और प्रेम के सजीव स्मारक बन गए। कालान्तर में ये मन्दिर स्थानीय व्यक्तियों के धार्मिक जीवन के अभिन्न अंग बन गए तथा वे लोग इन मन्दिरों में उपासना करने तथा सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का निराकरण करने के उद्देश्य से एकत्रित होने लगे।

मन्दिरों के मण्डपों में देवदासियां नृत्य करतीं तथा भजन मण्डलियाँ धार्मिक कीर्तन करती थीं। प्रायः प्रत्येक मन्दिर के साथ एक निःशुल्क विद्यालय संयुक्त रहता था तथा अधिक महत्त्व के मन्दिरों में महाविद्यालय अर्थात् विश्वविद्यालय होते थे जहाँ धार्मिक एवं अन्य विषयों की निःशुल्क शिक्षा का प्रबन्ध था । इन मन्दिरों, विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के व्यय के लिये अनेक ग्राम अनुदान में दिये जाने की व्यवस्था की गयी थी । इण्णाइरम (Ennayiram) मन्दिर के महाविद्यालय में 340 विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती थी तथा यहाँ शिक्षा देने के लिए दस विभागों की स्थापना की गई थी । इस प्रकार दक्षिणी भारत के मन्दिर स्वयं ही विद्यालयों एवं महाविद्यालयों का रूप धारण कर गये थे ।

उपरोक्त विश्वविद्यालयों के स्नातकों ने ही विदेशों में दूर-दूर तक भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रसार करके वृहत्तर भारत (Greater India) का प्राचीनकाल में निर्माण किया था।

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