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मुगलकालीन स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए

मुगलकालीन स्थापत्य कला में विभिन्न शैलियों का सम्मिश्रण है, जिसमें कुछ भारतीय है और कुछ विदेशी विदेशी तत्वों में ईरानी प्रमुख हैं। अकबर ने ईरानी कला के लक्षणों को भारतीय कला परम्पराओं के साथ अपना लिया था। कुछ वर्षो बाद भारतीय शिल्पियों ने विदेशी कला के सिद्धान्तों को इस प्रकार परिवर्तित और संशोधित रूप में अपना लिया था कि वे भारतीय कला के साथ मिलकर देशी प्रतीत होते हैं।

मुगल कला जो अनेक प्रभावों का सम्मिश्रण थी, अपने पूर्वकाल की कला की अपेक्षा अधिक विशिष्ट और अलंकरणवाली थी और इसकी रमणीयता तथा अलंकरण इसके पूर्व की कला की सादगी और भीमकायता के विपरीत थे। मुगलकाल की भवन-निर्माण-कला की विशेषताएँ हैं-ऊँचे गुम्बद, भवनों के कोनों पर पतले और छोटे मीनार, पतले स्तम्भ, नुकीली मेहराबें, रंग-बिरंगी पच्चीकारी, जड़ाऊ काम, सुन्दर नक्काशी आदि । भवनों में दृढ़ता और विशालता है। अकबर के शासनकाल तक भवनों में लाल पाषाण का उपयोग होता रहा और उसके बाद श्वेत संगमरमर का ।

(1) बाबर और स्थापत्य-कला-बाबर वास्तुकला का प्रेमी था। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि “केवल आगरा में वहाँ के संगतराशों में से प्रतिदिन 680 व्यक्तियों को अपने महलों में काम करने के लिए लगाता था और आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा धौली में मेरी इमारतों पर प्रतिदिन 1491 मजदूर कार्य करते थे । ” बाबर ने पानीपत में काबुली बाग की मस्जिद तथा सम्भल में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। ये दोनों मस्जिदें 1526 ई. में बनी थीं। इनकी शैली पूर्णरूपेण भारतीय है।

(2) हुमायूं और स्थापत्य-कला-हुमायूं भी कला-प्रेमी था। उसने दिल्ली में ‘दीनपनाह’ नामक महल बनवाया । उसने आगरा और फतेहाबाद में मस्जिदों का निर्माण करवाया। हुमायूं की पत्नी हाजी बेगम ने ‘हुमायूं का मकबरा’ बनवाया। इस मकबरे पर ईरानी- शैली का प्रभाव है।

(3) शेरशाह और स्थापत्य-कला-शेरशाह को भी वास्तुकला में काफी रुचि थी। उसने अनेक इमारतें बनवाईं जिनमें दिल्ली के समीप पुराने किले की मस्जिद तथा सहसराम का मकबरा उल्लेखनीय हैं। इनमें सहसराम का मकबरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसका बाहरी भाग मुस्लिम शैली में तथा भीतरी भाग हिन्दू ढंग से बना है। डॉ. वी.ए. स्मिथ का कथन है कि “सहसराम में शेरशाह का मकबरा जो झील के बीच में चबूतरे पर बना हुआ है, एक श्रेष्ठ डिजायन होने के साथ ही भारत की श्रेष्ठ इमारतों में से एक है।’

(4) अकबर और स्थापत्य कला – अकबर के शासनकाल में वास्तुकला का काफी विकास हुआ। उसके काल में अनेक इमारतों का निर्माण हुआ। अबुल फजल लिखता है- “सम्राट भव्य भवनों की योजना बनाते हैं और अपने मस्तिष्क तथा हृदय की रचना को पत्थर तथा मिट्टी के वस्त्र पहनाते हैं।” अकबर ने भारतीय तथा विदेशी शैलियों के बीच समन्वय स्थापित किया।

अकबरकालीन इमारतों की विशेषताएँ

  1. अकबर की इमारतों में कारीगरी उच्चकोटि की है।
  2. इमारतें सुन्दर, सजीव हैं। सादगी के कारण सुन्दरता में अभिवृद्धि हुई है ।
  3. निर्माण शैली की विशेषता सजावटपूर्ण है।
  4. प्रायः सभी इमारतों में लाल पत्थर का प्रयोग हुआ है ।
  5. कहीं-कहीं इमारतों की शोभा को बढ़ाने के लिए संगमरमर का भी प्रयोग हुआ परन्तु इसका प्रयोग बहुत कम है।
  6. दो इमारतों के स्तूप एक समान नहीं हैं ।

अकबरकालीन इमारतें

अकबर द्वारा निर्मित इमारतों में आगरा का किला प्रसिद्ध है। इसका निर्माण 1565 ई. में कासिम खां के नेतृत्व में प्रारम्भ किया गया। यह किला 15 वर्ष में पूर्ण हुआ तथा इसके निर्माण में 15 लाख रुपया व्यय हुआ। यमुना नदी के किनारे लगभग एक मील के घेरे में यह स्थित है। इसकी दीवारें 70 फीट ऊँची है। यह लाल पत्थर का बना हुआ है। अकबर ने आगरा के किले में ‘जहाँगीरी महल’ का भी निर्माण करवाया। इसके निर्माण में हिन्दू-शैली का अधिक प्रयोग हुआ है।

इसमें मेहराबों को सुन्दर ढंग से बनाया गया है। इसकी विशेषता कड़ियों तथा तोड़ों में है। इसके अतिरिक्त अकबर ने ‘अकबरी महल’, लाहौर का किला, इलाहाबाद का किला, अजमेर का किला आदि का भी निर्माण करवाया।

अकबर ने फतहपुर-सीकरी में अनेक इमारतों का निर्माण करवाया। इन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का सामंजस्य दिखाई देता है। इनमें हमें भारतीय स्थापत्य कला के पूर्णरूप से दर्शन होते हैं। यहाँ की मुख्य इमारतों में ‘दीवान-ए-आम’, ‘दीवान-ए-खास’, ‘तुर्की सुल्ताना का महल’, ‘खास महल’, ‘जोधाबाई का महल’, ‘हवा महल’, ‘मरियम का महल’, ‘बीरबल का महल’, ‘जामा मस्जिद’, ‘बुलन्द दरवाजा’, ‘शेख सलीम चिश्ती का मकबरा’ आदि उल्लेखनीय हैं।

(5) जहांगीर तथा स्थापत्य-कला-जहांगीर के शासनकाल में भी अनेक इमारतों का निर्माण किया गया। इन इमारतों में ‘अकबर का मकबरा’, ‘जहांगीर का मकबरा’, ‘एतमादुद्दौला का मकबरा’, ‘मरियम उजमानी का मकबरा’ आदि उल्लेखनीय हैं।

(6) शाहजहाँ और स्थापत्य-कला-शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल वास्तुकला अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई। डॉ. ईश्वरी प्रसाद का कथन है कि “मुगलकाल का सबसे महान् निर्माता शाहजहाँ था । उसका शासनकाल भारतीय स्थापत्य कला के इतिहास में स्वर्ण युग के नाम से प्रसिद्ध है। भारतीय वैभव और कला का पूर्ण विकास इस सम्राट द्वारा बनवाये गये भव्य भवनों और मकबरों में झलकता है। इमारतों की विशालता और साथ ही साथ उनकी सुकुमारता भारतीय कला और कारीगरी की विशेषताएँ हैं जो दूसरे देशों की इमारतों में कदाचित ही देखने को मिलेंगी। स्वच्छ व निर्मल संगमरमर की बनी हुई इमारतें अपनी भव्यता के लिए संसार में प्रसिद्ध हैं।”

शाहजहाँकालीन शैली के विषय में डॉ. समर बहादुरसिंह लिखते हैं कि “शाहजहाँ के भवनों में देशी-विदेशी शैलियों का सामंजस्य था। कटावदार मेहराब, छरहरे खम्भे, बल्बनुमा गुम्बद, फव्वारों का आयोजन आदि इस शैली की विशेषताएँ थीं। अकबरी प्रासादों का अलंकरण बेल-बूटों की नक्काशी तथा दीवारों और छतों पर रंग-बिरंगे चित्रों से होता था। लाल पत्थरों में वह फबता भी खूब था, किन्तु संगमरमर में इस तरह के अलंकरण की गुंजाइश ज्यादा न थी। शाहजहाँ ने इस अलंकरण के लिए वह विशिष्ट शैली अपनाई, जिसे पच्चीकारी कहते हैं।”

शाहजहाँ ने अनेक इमारतों का निर्माण करवाया, उनमें आगरा के किले में दीवाने आम, महली भवन, दीवाने खास, शीशमहल, खास महल, झरोखा-दर्शन, मुसम्मन बुर्ज, नगीना मस्जिद, मोती मस्जिद आदि उल्लेखनीय हैं। मोती मस्जिद आगरा के किले की सबसे सुन्दर इमारत है । शाहजहाँ ने दिल्ली में लालकिले का भी निर्माण करवाया। इस किले में उसने संगमरमर की अनेक भव्य इमारतें बनवाईं जिनमें रंगमहल, हीरा महल तथा मोतीमहल का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त शाहजहाँ ने लालकिले में दीवाने आम, दीवाने खास आदि इमारतें भी बनवाईं। शाहजहाँ ने लालकिले के पास ही ‘जामा मस्जिद’ का भी निर्माण करवाया। यह वास्तुकला का एक सुन्दर नमूना है। शाहजहाँ ने विश्व-विख्यात ‘ताजमहल’ का भी निर्माण करवाया। इसका निर्माण 1631 ई. में आरम्भ हुआ तथा 1653 ई. में पूरा हुआ। इसका निर्माण शाहजहाँ ने अपनी अ बेगम मुमताज महल की याद में करवाया था।

(7) औरंगजेब तथा वास्तुकला – शाहजहाँ की मृत्यु के पश्चात् मुगल वास्तुकला का पतन प्रारम्भ हो गया। औरंगजेब को न तो इमारतें बनवाने का शौक था और न उसके पास इतना समय था कि वह इस ओर ध्यान दे पाता। इसके अतिरिक्त उसकी धार्मिक रूढ़िवादिता भी वास्तुकला के पतन के लिए उत्तरदायी थी। उसके समय में ‘रवियाउद्दौरानी का मकबरा’, दिल्ली की मोती मस्जिद तथा लाहौर की बादशाही मस्जिद का निर्माण करवाया गया।

इस प्रकार वास्तुकला सही रूप में अकबर के युग से प्रारम्भ होकर शाहजहाँ के युग अपने चरम-विकास पर पहुँच कर औरंगजेब के काल में पतन के गर्त में गिर गई।

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