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आतंकवाद क्या है? आतंकवाद के कारणों एवं वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिए

आतंकवाद एक ऐसी विचारधारा है जो अपनी स्वार्थसिद्धि और राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हर प्रकार की शक्ति तथा अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग करने में विश्वास रखती है। अस्त्र-शस्त्रों का ऐसा घृणित प्रयोग प्रायः विरोधी वर्ग, समुदाय, सम्प्रदाय अथवा राष्ट्र विशेष को गैर-कानूनी ढंग से डराने, धमकाने, जान से मार देने, हिंसा के माध्यम से सरकार को गिराने तथा शासन तंत्रों पर अपना प्रभुत्व जमाने के उद्देश्य से किया जाता है।

इस प्रकार आतंकवाद उस प्रवृत्ति को कहा जाता है जिसके माध्यम से कतिपय अवांछित तत्त्व अपनी सभी प्रकार की माँगें मनवाने. के लिए अनेकानेक प्रकार के घोर हिंसात्मक उपायों एवं जघन्य अमानवीय साधनों एवं अस्त्र- शस्त्रों का प्रयोग करते हैं।

आतंकवाद क्या है?

आज लगभग सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद की चपेट में आया हुआ है, राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सार्वजनिक हिंसा और सामूहिक हत्याओं का कुत्सित रास्ता अपनाया जा रहा है। भौतिक दृष्टि से समृद्ध और विकसित समझे जाने वाले देशों में आतंकवाद की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से पनप रही है।

अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी, भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी तथा राजीव गाँधी की नृशंस हत्या, भारत के हवाई जहाज का पाकिस्तान में अपहरण, अमरीका के पर्ल हार्बर, वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर तथा पेंटागन पर हमला (2001), भारतीय संसद पर हमला (2001), मुम्बई पर हमला (2008), पेशावर (पाकिस्तान) में स्कूल में 132 बच्चों की हत्याएँ (16 दिसम्बर, 2014), पेरिस में आतंकवादी हमला (15 जुलाई, 2016), न्यूजीलैण्ड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में हमला (15 मार्च, 2019), पाकिस्तान के कराची स्टॉक एक्सचेंज पर हमला (29 जून, 2020) तथा सियोल (द. कोरिया) में अक्टूबर, 2022 में बम विस्फोट आदि अनेक ऐसी घटनाएँ हैं, जिन्हें अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के कतिपय महत्त्वपूर्ण उदाहरण कहा जा सकता है।

आतंकवाद की परिभाषा

आतंकवाद का अर्थ है-“हिंसा का ऐसा प्रयोग, जो सैनिक दृष्टि से नहीं, बल्कि लक्ष्य (शिकार) को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करे।” दूसरे शब्दों में, आतंकवाद एक तरह का भयादोहन (blackmail) है। इसकी प्रमुख उपयोगिता राजनीतिक व राजनयिक है। यही बुनियादी फर्क क्रांतिकारियों और आतंकवादियों में है ।

लांगमैन मॉडर्न इंगलिश डिक्शनरी के अनुसार, “शासन करने या राजनीतिक विरोध आतंकवाद है।” प्रकट करने के लिए भय का एक विधि के रूप में उपयोग करने की नीति को प्रेरित करना ही

2 अक्टूबर, 2018 को यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने अपनी नई दिल्ली यात्रा के आतंक को प्रश्रय नहीं दिया। दौरान कहा कि आतंकवाद की साझा परिभाषा तय करना मुश्किल है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कभी आतंक को श्रेय नहीं दिया

आतंकवाद की उत्पत्ति में सहायक कारण

आतंकवाद की उत्पत्ति में विभिन्न कारणों का सम्मिलित सहयोग रहा है—-

(i) वर्तमान तकनीक – विशेष रूप से वर्तमान तकनीकी प्रगति इसके लिए अधिक उत्तरदायी है। इसके परिणामस्वरूप आतंकवादियों के पास अत्याधुनिक मारक हथियार, यातायात तथा संचार के साधन उपलब्ध हैं।

अर्द्धसैनिक बल तथा सैनिक कमाण्डो आधुनिक आतंकवाद को रोकने में इसीलिए असफल सिद्ध होते हैं क्योंकि उनके पास वे हथियार या विशिष्ट तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं हैं जो आतंकवादियों के पास मौजूद हैं।

संचार के प्रभावी और त्वरित विश्वव्यापी साधनों का लाभ भी आतंकवादी संगठनों ने उठाया है।

(ii) कुछ राष्ट्रों की भूमिका- आतंकवाद को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फलने-फूलने में एक सहायक कारण कुछ राष्ट्रों द्वारा आतंकवादियों को दिये जाने वाले हथियार तथा प्रशिक्षण आदि की सुविधाएँ हैं। उदाहरणार्थ, कनाड़ा और पाकिस्तान में हिंसात्मक कार्यों के लिए आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर कार्यरत हैं। मैक्सिको में भारत में कार्यरत आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। चीन भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में आंतंकवादियों, विशेषकर मिजोरम नेशनल फ्रन्ट (M.N.F) और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (P.L.A.) को लगातार सहायता प्रदान करता रहा है। अमेरिका तथा ब्रिटेन में भारत विदेशी प्रचार और घृणा खुले आम प्रचारित होती है।

(iii) विभिन्न शक्तियाँ- अविकसित राष्ट्रों में उत्पन्न जातीय धार्मिक विभेद और पृथकतावादी ताकतों ने भी आतंकवाद की छाया को और अधिक गहरा बनाया है।

(iv) नशीले पदार्थ- नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार ने भी आधुनिक आतंकवाद को प्रोत्साहन देने में काफी सहायता पहुँचाई है। नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार में अफीम, हेरोइन, ब्राउन शुगर के साथ-साथ स्वचालित हथियारों की तस्करी भी प्रमुख है।

(v) शोषण और अन्याय की प्रवृत्ति- विश्वभर में आतंकवाद के पनपने का एक प्रमुख कारण शोषण और अन्याय की प्रवृत्ति का पाया जाना है। साम्राज्यवाद के द्वारा अविकसित और निर्धन देशों का शोषण किया जाना अन्याय की प्रवृत्ति को जन्म देता है और आतंकवाद फैलाता है।

(vi) आतंकवादियों को विदेशों से सहायता प्राप्त होना- विश्व में आज भी अनेक ऐसे देश हैं जो दूसरे देशों को आतंकवाद रोकने में सहायता नहीं देते बल्कि अस्थिरता फैलाने के लिए आतंकवादियों को आर्थिक और राजनीतिक सहायता उपलब्ध करवाते हैं। पाकिस्तान भारत में इसी तरह का आतंक फैला रहा है।

(vii) युवकों में बढ़ती निराशा- आज का युवक अधिक महत्त्वाकांक्षी है जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तस्करी, नशीले पदार्थों का व्यापार और आतंकवाद से जुड़ जाता है। यह सब युवकों में फैलती बेरोजगारी, गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद के कारण होता है।

(viii) दलीय राजनीति- कुछ राजनीतिक दल भी आतंकवाद को बढ़ाने का कार्य करते हैं। वे वोटों के लालच में गलत से गलत काम करने को तैयार हो जाते हैं। ये दल चुनाव जीतने के लिए आतंक संगठनों का भी सहारा लेते हैं और राजनीति को प्रभावित करते हैं।

इसके अतिरिक्त धार्मिक जिहाद उपनिवेशवाद, अनेक राष्ट्रों की आतंकवाद के प्रति मेक्षापूर्ण नीति, विभिन्न राष्ट्रों के अपने-अपने आर्थिक और राजनीतिक हित आदि भी आतंकवाद अन्य कारण कहे जा सकते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद की वर्तमान स्थिति

अमरीका में आतंकवादी गतिविधियाँ, 2001 के बाद- अनेक आतंकवादी गतिविधियाँ विश्व के अनेक देशों में होती रही हैं, लेकिन आतंकवाद को राष्ट्रीय घटना ही माना गया, यह शायद पहला ही अवसर था कि जब 11 सितम्बर, 2001 को अमरीका के न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर और वाशिंगटन में पेंटागन पर हुए आतंकवादी हमलों के कारण आतंकवाद अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन गया।

इस आतंकवादी हमले में समूचे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का एक भयंकर और घिनौना रूप देखा जिसके फलस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की बुराई का सामना करने की भारी आवश्यकता अनुभव की गई तथा इस आवश्यकता के पक्ष में एक दृढ़ विश्व जनमत उभर कर सामने आया। अमरीका ने इस हमले के लिए ओसामा बिन लादेन और अफगानिस्तान के तालिबान मलीशिया को जिम्मेदार मानते हुए अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया और अफगानिस्तान से तालिबान मलीशिया शासन को उखाड़ फेंका और अन्तत: 2 मई, 2011 को पाकिस्तान के एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन-

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की समाप्ति का प्रण लिया तथा अक्टूबर, 2001 में अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध एक शक्तिशाली सैनिक कार्यवाही आरम्भ की ताकि आतंकवाद को जड़ से समाप्त किया जा सके।

(2) अफगानिस्तान में चल रहे अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के समय में ही 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद पर हुई आतंकवादी कार्यवाही ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के बढ़ रहे खतरे के प्रति एक बार फिर एक दृढ़ विश्व जनमत को पैदा किया।

(3) लगभग सभी देशों ने अपने-अपने कानून पास करके, द्विपक्षीय घोषणाएँ तथा सन्धियों के द्वारा तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सहयोग स्थापित करके अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की मुसीबत का सामना करने के प्रयासों को और तेज करने तथा दृढ़ बनाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास आरम्भ कर दिए।

(4) आतंकवाद पर नियन्त्रण तथा इसकी समाप्ति को एक अन्तर्राष्ट्रीय उद्देश्य मानकर बहुत से राज्यों ने आतंकवाद के विरुद्ध अपने-अपने कानून पास किए।

(5) सितम्बर, 2002 में इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद विश्व के सभी देशों ने एक बार फिर अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की मुसीबत की भयंकरता को अनुभव किया तथा इसके विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष करने का प्रण दोहराया।

(6) इराक युद्ध द्वारा अमरीका ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था, विश्वीकरण, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, निःशस्त्रीकरण, आतंकवाद तथा मानव अधिकारों के सम्बन्ध में अपने विचारों को विश्व पर लादने की अपनी क्षमता का परिचय दिया।

(7) 26 नवम्बर, 2008 को मुम्बई में आतंकी हमला हुआ जिसमें नरीमन हाउस, होटल ट्राइडेण्ट और ताज होटल पर हमला किया गया जिसमें 185 लोगों की जानें गई ।

(8) 16 दिसम्बर, 2014 को पाकिस्तान के पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल में आतंकवादियों द्वारा हमला किया गया तथा 132 बच्चों सहित कुल 145 लोगों की नृशंस हत्या कर आतंकवाद का अत्यन्त ही घिनौना रूप विश्व समुदाय के सामने प्रस्तुत किया गया।

(9) संयुक्त राष्ट्र महासभा के 70वें अधिवेशन के दौरान 28 सितम्बर, 2015 को अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न्यूयार्क में ‘आतंकवाद की परिभाषा’ को संयुक्त राष्ट्र संघ से परिभाषित करने की अपेक्षा व्यक्त की है तथा पाकिस्तान सहित अन्य देशों में जहाँ भी आतंकवाद पनपता है, की दोनों देशों ने घोर निन्दा की है तथा मिलकर मुकाबला करने का संकल्प किया है।

(10) 18 सितम्बर, 2016 को जम्मू-कश्मीर में बारामूला के उरी सेक्टर के हैडक्वार्टर पर सोए हुए सैनिकों पर आतंकी हमला जिसमें 18 जवान शहीद हुए तथा 19 बुरी तरह जख्मी हुए।इसकी विश्व भर के नेताओं ने कड़ी निन्दा की।

(11) 15 अक्टूबर, 2017 को अफ्रीकी देश सोमालिया की राजधानी मोगादिशू में हुए बम धमाके में 250 लोग घायल हुए तथा 276 लोगों के मरने की पुष्टि हुईं।

(12) 1 मई, 2018 को काबुल (अफगानिस्तान) में आतंकी संगठन ISIS ने तीन अलग-अलग आत्मघाती बम धमाके किए जिसमें मीडिया के 9 पत्रकारों और 11 बच्चों सहित 41 लोगों की मौत हो गई।

(13) 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा, श्रीनगर (भारत) में सैन्य कैंप पर सबसे बड़ा आतंकी हमला किया गया जिसमें लगभग 42 जवान शहीद हुए तथा 35 घायल हुए।

(14) 29 जून, 2020 को पाकिस्तान के कराची स्टॉक एक्सचेंज में आतंकवादी घटना में 11 लोगों की मौत हो गई।

(15) अक्टूबर, 2021 में अफगानिस्तान के कुंदुंज प्रांत की मस्जिद में बम विस्फोट हुआ जिसमें लगभग 100 व्यक्ति मारे गये तथा अनेक घायल हुए।

(16) 30 सितम्बर, 2022 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक कोचिंग सेंटर पर आत्मघाती हमला हुआ जिसमें कम से कम 19 लोगों की मौत हुई तथा करीब 30 घायल हुए ।

आतंकवाद के विभिन्न रूप

आतंकवाद की अभिव्यक्ति विभिन्न रूपों में दिखाई देती है जिनमें से चार प्रमुख रूप इस प्रकार हैं-

(1) आतंकवाद का प्रथम रूप मानव बम है। यह एक ऐसा हथियार है जिसकी काट अब तक विश्व की किसी भी सुरक्षा एजेन्सी, सरकार और सेना के पास नहीं है। मरने और मारने का संकल्प लिए उच्च विस्फोटकों से लैस चलता-फिरता कोई युवक या युवती आर.डी.एक्स. को बेल्ट में भरकर अपने कमर से बाँधे रहता है जो ब्लास्टिंग कैप और बैटरी से जुड़ी रहती है। बेल्ट में भरे विस्फोटक का विस्फोटन इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली पर आधारित होता है जिसे मात्र एक छोटे से बटन को दबाकर विस्फोटित किया जा सकता है और वह बटन मानव बम बने व्यक्ति की सुविधाजनक पहुँच के भीतर मौजूद रहता है। एक आंकलन के अनुसार इस समय विश्व में 75 से भी अधिक आतंकवादी संगठन हैं जिनके पास मानव बम मौजूद हैं। इनमें श्रीलंका का उग्रवादी संगठन ‘लिट्टे’ सबसे प्रमुख है।

अमेरिकी गृह मंत्रालय की 2000 की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय पूरी दुनिया में 550 से 600 तक की संख्या में मानव बम तैयार स्थिति में घूम रहे हैं और वे कुछ भी कर सकते हैं। आज विश्व के किसी भी देश पर मानव बमों के हमले का खतरा मंडरा रहा है। सर्वाधिक खतरा ओसामा बिन लादेन के अल कायदा से है, क्योंकि यह विश्व के खतरनाक से खतरनाक हथियारों से सुसज्जित सबसे बड़ा खतरनाक और सर्वाधिक सम्पन्न आतंकवादी संगठन है। इसका नेटवर्क विश्व के 60 देशों से भी अधिक में फैला हुआ है।

(2) आतंकवाद का दूसरा रूप सुगठित और समुचित रूप से वित्त पोषित संगठन के रूप में दिखाई देता है जो अपनी हिंसक और बलकारी गतिविधियों द्वारा सम्पूर्ण जनमानस को जेहाद’ जैसे संगठनों द्वारा सम्पन्न की जाती है। ये समूह आदेश, सदस्यता और अपने मुख्यालय आतंकित करते हैं। आतंकवादी गतिविधियाँ ‘अरब रिवोल्यूशनरी ब्रिगेड’ और ‘इस्लामिक से आबद्ध होते हैं। ‘ग्लोबल टेरेरिज्म इंडेक्स 2017’ ने दुनिया के 162 देशों का अध्ययन करते हुए आतंकवाद के सर्वाधिक शिकार 50 देशों का इंडेक्स प्रस्तुत किया है जिसमें क्रमशः इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान, सोमालिया, भारत, तुर्की, लीबिया, मिस्र, फिलिपाइन्स आदि का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। समसामयिक विश्व के कुछ प्रमुख आतंकवादी संगठन, यथा-डाइरेक्ट एक्शन ग्रुप (फ्रांस), मोसाद (इजरायल), जनता विमुक्ति पेरूमन (श्रीलंका), फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (फिलिस्तीन) आदि सक्रिय आतंकवादी गुट हैं।

(3) आतंकवाद का तीसरा रूप राज्य प्रायोजित आतंकवाद है। विश्व के कई देश प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से आतंकवाद को शह व प्रश्रय दे रहे हैं। पैटर्न्स ऑफ ग्लोबल टेरेरिज्म, 1989 नामक रिपोर्ट में 6 राष्ट्रों-क्यूबा, ईरान, इराक, लीबिया, उत्तरी कोरिया, दक्षिणी यमन और सीरिया को राज्य प्रायोजित आतंकवाद का समर्थक माना गया है। ऐसे देशों की सूची में अब पाकिस्तान का नाम भी जुड़ गया है। पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी आई.एस.आई. ने भारत में दो दशकों से आतंकवाद फैला रखा है।

(4) आतंकवाद का चौथा रूप इस्लामिक आतंकवाद है। इसका तात्पर्य यह है कि जो राष्ट्र इस्लाम को मानते हैं वे आतंकवाद के रास्ते पर हैं या दूसरे अर्थ में कहें तो इस्लाम का कट्टरवादी नेतृत्व पूरी दुनिया में रहने वाले इस्लाम के अनुयायियों को अपने साथ लेकर चलना चाहता है और विश्व के अनेक क्षेत्रों में इस्लामी राज्य स्थापित करना चाहता है। इस्लाम के प्रति निष्ठा उन्हें एक भावना के सूत्र में बाँधती है जो देश की सीमा विभाजन से प्रभावित नहीं होती।

यही इस्लामिक भावना जुनून की हद तक पहुँच जाती है जो उन लोगों के विरुद्ध कार्य करती है जो इस विचारधारा को नहीं मानते। यह जुनून इस सीमा तक इन पर सवार हो जाता है कि ये आत्म बलिदान के लिए प्रेरित हो जाते हैं। इस संघर्ष को वे ‘जेहाद’ कहते हैं और जेहाद के जुनून में वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर जैसी इमारतों को कब्रगाह बनाने में फक्र का अनुभव करते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि अनेक इस्लामिक देशों में आतंकवाद एक सुगठित स्वतंत्र विचारधारा का रूप लेता जा रहा है। जिसे एक विषय की तरह आतंकवादी विश्वविद्यालय खोलकर पढ़ाया जाने लगा है और नवीन आतंकवादी तकनीकों पर शोध की जाने लगी है। इन विश्वविद्यालयों में मुस्लिम नवयुवकों को ही प्रशिक्षित किया जाता है, जा रहा है जो इस्लामिक आतंकवाद का जहर फैलाते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 21वीं शताब्दी में अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद को एक सबसे बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय मुसीबत के रूप में देखकर इसके विरुद्ध दृढ़ कार्यवाही की योजना बनाई गई तथा इसको सफलतापूर्वक लागू करना भी आरम्भ किया गया। आज आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध सफलता से चल रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा के लिए एक भयंकर खतरा माना जा रहा है जिसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की मुसीबत का सामना करने की आवश्यकता पर अधिक से अधिक ध्यान दे रहा है तथा इसको समाप्त करने के लिए कटिबद्ध है।

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